सिद्धान्तशारवेत्ताहं बीजोऽहमिति बोधकृत् ।
अविच्छिन्नः सदा हृष्टहृदयो गुरुरुच्यते ॥
'सिद्धान्त का सार जानने वाला में बीज हूँ', इस प्रकार का बोध देने वाला सदा आनन्दित रहने बाला 'गुरु' कहलाता है।
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