नित्य, नैमित्तिक, काम्य कर्मों में तत्पर रहने वाले, राग, द्वेष, भय, क्लेश, दम्भ, अहङ्कार से रहित, अपनी विद्या के अनुष्ठान में लगे हुये, तपोधर्म का प्रकाश करने वाले, यथाप्राप्त से सन्तुष्ट, गुण, दोष के विवेचक, स्त्री-धनादि में अनासक्त, दुःसङ्ग, व्यसनादि से रहित, सर्वाहंभाव से युक्त, निर्द्वन्द्व, व्रतपरायण, अलोलुप, अहिंसक, विद्वान्, धन विद्यादि द्वारा मन्व-यन्त्र तन्त्रादि को न बेचने वाले, निःसङ्ग, निर्विकल्प, अर्थ निर्णायक, अति धार्मिक, निन्दास्तुति मे समभाव रखने वाले, निरपेक्ष, नियम निर्देश करने वाले इत्यादि - है प्रिये! इस प्रकार के लक्षण से युक्त श्रीगुरु कहे गये हैं।
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