मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
कुलार्णव • अध्याय 13 • श्लोक 10
नित्ये नैमित्तिके काम्ये रतः कर्मण्यनिन्दिते । रागद्वेष भयक्लेशदम्भाहङ्कारवर्जितः स्वविद्यानुष्ठानरतो धर्मादीनामुपार्जकः ॥ यदृच्छालाभसन्तुष्टो गुणदोषविभेदकः ॥ स्त्रीधनादिष्वनासक्तो दुःसङ्गव्यसनादिषु । सर्वाहम्भावसंयुक्तो निर्द्वन्द्वो नियतव्रतः ॥ अलोलुपो ह्यसङ्कल्पपक्षपाती विचक्षणः । वित्तविद्यादिभिर्मन्त्रयन्त्रतन्त्राद्यविक्रयी ॥ निःसङ्गो निर्विकल्पश्च निर्णीतार्थोऽतिधार्मिकः । तुल्यनिन्दास्तुतिर्मोनो निरपेक्षो निरामयः । इत्यादिलक्षणोपेतः श्रीगुरुः कथितः प्रिये ॥
नित्य, नैमित्तिक, काम्य कर्मों में तत्पर रहने वाले, राग, द्वेष, भय, क्लेश, दम्भ, अहङ्कार से रहित, अपनी विद्या के अनुष्ठान में लगे हुये, तपोधर्म का प्रकाश करने वाले, यथाप्राप्त से सन्तुष्ट, गुण, दोष के विवेचक, स्त्री-धनादि में अनासक्त, दुःसङ्ग, व्यसनादि से रहित, सर्वाहंभाव से युक्त, निर्द्वन्द्व, व्रतपरायण, अलोलुप, अहिंसक, विद्वान्, धन विद्यादि द्वारा मन्व-यन्त्र तन्त्रादि को न बेचने वाले, निःसङ्ग, निर्विकल्प, अर्थ निर्णायक, अति धार्मिक, निन्दास्तुति मे समभाव रखने वाले, निरपेक्ष, नियम निर्देश करने वाले इत्यादि - है प्रिये! इस प्रकार के लक्षण से युक्त श्रीगुरु कहे गये हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुलार्णव के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

कुलार्णव के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें