हे देवि! मैं शिव हूँ। मेरी कोई आकृति नहीं है। मनुष्यों की दृष्टि में आने वाला मैं नहीं हूँ। इसलिये श्रीगुरुरूप से शिव धार्मिक शिष्यों की सदा रक्षा करते हैं। मनुष्य चर्म में साक्षात् परशिव स्वयं आबद्ध होते हैं और पृथ्वी पर गुप्तः रूप से सच्छिष्यों पर अनुग्रह करने के लिये भ्रमण करते हैं। सद्भक्तों की रक्षा के लिए ही निराकार भी आकृतियुक्त होता है। दयासागर शिव इस लोक में संसारी के समान चेष्टा करते हैं।
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