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कुलार्णव • अध्याय 13 • श्लोक 12
शिवोऽहं नाकृतिर्देवि नरदृग्गोचरो नहि । तस्मात् श्रीगुरुरूपेण शिष्यान् रक्षति धार्मिकान् ॥ मनुष्यचर्मणा बद्धः साक्षात् परशिवः स्वयम् । सच्छिष्यानुग्रहार्थाय गूढं पर्यटति क्षितौ ॥ सद्भक्तरक्षणायैव निराकारोऽपि साकृतिः । शिवः कृपानिधिलोंके संसारीव हि चेष्टते ॥
हे देवि! मैं शिव हूँ। मेरी कोई आकृति नहीं है। मनुष्यों की दृष्टि में आने वाला मैं नहीं हूँ। इसलिये श्रीगुरुरूप से शिव धार्मिक शिष्यों की सदा रक्षा करते हैं। मनुष्य चर्म में साक्षात् परशिव स्वयं आबद्ध होते हैं और पृथ्वी पर गुप्तः रूप से सच्छिष्यों पर अनुग्रह करने के लिये भ्रमण करते हैं। सद्भक्तों की रक्षा के लिए ही निराकार भी आकृतियुक्त होता है। दयासागर शिव इस लोक में संसारी के समान चेष्टा करते हैं।
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