यस्तत्त्वविन्महेशानि स पशुं बोधयत्यपि ।
तत्त्वहीनात् कुतोऽध्यात्मतत्त्वज्ञानपरिग्रहः ॥
हे महेशानि! जो तत्त्वज्ञ है, वही साधुजनों को प्रबुद्ध करता है। तत्त्वहीन को अध्यात्म का तत्त्वज्ञान कैसे होगा।
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