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कुलार्णव • अध्याय 13 • श्लोक 4
रहस्यभेदकं वापि देवि कार्यविनाशकम् । मार्जारबकवृत्तिञ्च रन्ध्रान्वेषणतत्परम् ॥ मायाविनं कृतघ्नञ्च प्रच्छन्नान्तरदायकम् । विश्वासघातकं स्वामिद्रोहिणं पापकारिणम् ॥ अविश्वासकरं संशयात्मकं सिद्धयका‌ङ्क्षिणम् । आततायिनमादित्सु कोपितं कूटसाक्षिणम् ॥
हे देवि! रहस्य को ढूँढ़ने वाले, कार्य बिगाड़ने वाले, बिल्ली व बगुले के स्वभाव वाले, छिद्रान्वेषी, मायावी, कृतघ्न, गुप्त बात को प्रकट करने वाले, विश्वासघाती, स्वामिद्रोही, पापी, अविश्वासी, संशयालु, सिद्धिकांक्षी, आततायी, क्रोधी एवं झूठी गवाही देने वाले व्यक्ति को शिष्य न बनाए।
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