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कुलार्णव • अध्याय 13 • श्लोक 45
येन वा दर्शित तत्त्वे तत्क्षणात्तन्मयो भवेत् । मन्यते मुक्तमात्मानं स गुरुर्नापरः प्रिये ॥
जिसके द्वारा तत्त्वज्ञान कराने पर साधक उसमें तुरन्त तन्मय होकर अपने को मुक्त अनुभव करने लगे, हे प्रिये! वही श्रेष्ठ गुरु है।
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