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कुलार्णव • अध्याय 13 • श्लोक 9
अग्रगण्योऽतिगम्भीरः शिवविष्णुसमः पात्रापात्रविशेषवित् । साधुर्मन्ददर्शनदूषकः ॥ निर्मलो नित्यसन्तुष्टः स्वतन्त्रो मन्त्रशक्तिमान् । सद्भक्तवत्सलो धीरः कृपालुः स्मितपूर्णवाक् ॥ भक्तप्रियः सदोदारो गम्भीरः शिष्टसाधकः । स्वेष्टदेवगुरुज्येष्ठ वनितापूजनोत्सुकः ॥
अग्रगण्य, गम्भीर, पात्र-अपात्र के विशेषज्ञ, शिव एवं विष्णु के समान, साधु, पशुदर्शन के दोष बताने वाले, निर्मल, नित्यसन्तुष्ट, स्वतन्त्र, मन्त्र-शक्तिमान्, भक्तवत्सल, धीर, कृपालु, प्रसन्नमुख, भक्तप्रिय, सब शास्त्रों के ज्ञाता, शुभ, शिष्ट, अपने इष्टदेव और गुरुओं, ज्येष्ठों, वनिताओं के पूजन में उत्सुक रहने वाले व्यक्ति को गुरु बनाना चाहिए।
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