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कुलार्णव • अध्याय 13 • श्लोक 78
पञ्चैते कार्यभूताः स्युः कारणं बोधको भवेत् । पूर्णाभिषेककर्त्ता यो गुरुस्तस्यैव पादुका । पूजनीया महेशानि बहुत्वेऽपि न संशयः ॥
इनमें से पाँच तो मात्र कार्यभूत गुरु है, छठा 'बोधक' गुरु कारण होता है। बहुत गुरुओं के होने पर भी जो गुरु पूर्णाभिषेक करता है, उसी की पादुका, हे महेशानि! पूजनीया है, इसमें सन्देह नहीं।
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