हे प्रिये! जो शिव सर्वव्यापी, सूक्ष्म, उन्मना, निष्कल, अव्यय, व्योमाकार, अजन्मा और अनन्त हैं, उनकी पूजा करना कैसे सम्भव है? हे देवि! इसी से शिव साक्षाद् गुरु रूप का आश्रय लेते हैं और भक्ति से सम्पूजित होकर भुक्ति एवं मुक्ति को प्रदान करते हैं।
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