मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
कुलार्णव • अध्याय 13 • श्लोक 11
यः शिवः सर्वगः सूक्ष्मश्चोन्मना निष्कलोऽव्ययः । व्योमाकारो हाजोऽनन्तः स कथं पूज्यते प्रिये ॥ अत एव शिवः साक्षाद्‌गुरुरूपं समाश्रितः । भक्त्या सम्पूजितो देवि भुक्तिं मुक्तिं प्रयच्छति ॥
हे प्रिये! जो शिव सर्वव्यापी, सूक्ष्म, उन्मना, निष्कल, अव्यय, व्योमाकार, अजन्मा और अनन्त हैं, उनकी पूजा करना कैसे सम्भव है? हे देवि! इसी से शिव साक्षाद् गुरु रूप का आश्रय लेते हैं और भक्ति से सम्पूजित होकर भुक्ति एवं मुक्ति को प्रदान करते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुलार्णव के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

कुलार्णव के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें