हे देवि! ठगने वाले, सर्वश्रेष्ठ होने का अभिमान करने वाले, निष्ठुर, आसक्त, गँवार, बहुभाषी, दुष्टविचार वाले, कुतर्की, झगड़ालू, व्यर्थ आक्षेप करने वाले, मूर्ख, चञ्चल, बात बनाने वाले, सामने प्रिय और पीठ पीछे दोष कहने वाले, (अज्ञानी होकर भी) ब्राह्मण के समान बोलने वाले, विद्या (साहित्य) चुराने वाले, आत्म प्रशंसक, गुणों को न सहने वाले (जरतुहा), अपकार करने वाले, कष्ट में व्याकुल होने वाले, क्रोधपूर्ण, अत्यधिक बोलने वाले, दुर्जनों के साथ रहने वाले, सर्वलोकनिन्दित, चुगुलखोर, परसन्तापी, प्रणयभङ्ग करने वाले, अपने कष्ट को कहने वाले, अपने स्वामी से विश्वासघात करने वाले, आत्मवञ्चक, जिह्नोपस्थ में आसक्त, चोर, पशु चेष्टा वाले, अकारण द्वेष, हास, क्लेश एवं क्रोध करने वाले, दुस्साहसी, मार्मिक परिहास करने वाले, कामुक, निर्लज्ज, झूठे एवं पापपूर्ण कार्यों के लिए उत्तेजित करने वाले, असूया, मद, मात्सूर्य, दम्भ, अहङ्कार से युक्त, ईर्ष्या, पारुष्य, पैशुन्य, कृपणता एवं क्रोध से युक्त मनवाले, अधीर, दुखी, भीरु, अशक्त, व्याकुल, अविकसित बुद्धि, मन्दबुद्धि, मूढ़, चिन्ताकुल, तृष्णा, लोभ से युक्त, दीन, असन्तोषी, सबसे माँगने वाले, बहुभोजी, कपटी, भ्रम फैलाने वाले, कुटिल, भक्ति, श्रद्धा, दया, शान्ति और धर्माचार से हीन, माता, पिता गुरुप्राज्ञ के सद्वचनों की हँसी उड़ाने वाले, कुलद्रव्यों के प्रति वीभत्स, गुरुसेवा का अभिमान करने वाले, स्त्रीद्वेषी, समयाचार से भ्रष्ट, गुरु से शापित आदि- इस प्रकार के दुर्गुणयुक्त व्यक्ति को हे कुलेश्वरि! गुरु शिष्य न बनाये।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुलार्णव के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
कुलार्णव के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।