मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
कुलार्णव • अध्याय 13 • श्लोक 5
सर्वप्रतारकं देवि सर्वोत्कृष्टाभिमानिनम् । असत्यं निष्ठुरासक्तं ग्राम्यादिबहुभाषिणम् ॥ दुर्विचारकुतर्कादिकारकं कलहप्रियम् । वृथाक्षेपकरं मूर्ख चपलं वाग्विडम्बकम् ॥ परोक्षे दूषणकरं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम् । वाग्ब्रह्मवादिनं विद्या चौरमात्मप्रशंसकम् ॥ गुणासहिष्णुमहितमार्त्तक्रोधनमम्बिके वाचालं दुर्जनसखं सर्वलोकविगर्हितम् ॥ पिशुनं परसन्ताप्यं सम्विदप्रणयं प्रिये । स्वक्लेशवादिनं स्वामिन्द्रोहिणं स्वात्मवञ्चकम् ॥ जिह्वोपस्थपरं देवि तस्करं पशुचेष्टितम् । अकारणद्वेषहासक्लेशक्रोधादिकारिणम् ॥ अतिहासमकर्माणं मर्मान्तपरिहासकम् । कामुकञ्चातिनिर्लज्जं मिथ्यादुश्चेष्टसूचकम् ॥ असूयामद‌मात्सर्यदम्भाहङ्कारसंयुतम् ईर्ष्यापारुष्यपैशुन्यकार्पण्यक्रोधमानसम् ॥ अधीरं दुःखिनं भीरुमशक्तस्तवमातुरम् । अप्रबुद्धमतिं मन्दं मूढं चिन्ताकुलं विटम् ॥ तृष्णालोभयुतं दीनमतुष्टं सर्वयाचकम् । बहाशिनं कपटिनं भ्रामकं कुटिलं प्रिये ॥ भक्ति श्रद्धादयाशान्तिधर्माचारविवर्जितम् । मातापितृगुरुप्राज्ञसद्वचोहास्यकारकम् ॥ कुलद्रव्यादिबीभत्सं गुरुसेवाभिमानिनम् । स्त्रीद्विष्टं समयभ्रष्टं गुरुशप्तं कुलेश्वरि । इत्यादिदुर्गुणोपेतं गुरुः शिष्यं विवर्जयेत् ॥
हे देवि! ठगने वाले, सर्वश्रेष्ठ होने का अभिमान करने वाले, निष्ठुर, आसक्त, गँवार, बहुभाषी, दुष्टविचार वाले, कुतर्की, झगड़ालू, व्यर्थ आक्षेप करने वाले, मूर्ख, चञ्चल, बात बनाने वाले, सामने प्रिय और पीठ पीछे दोष कहने वाले, (अज्ञानी होकर भी) ब्राह्मण के समान बोलने वाले, विद्या (साहित्य) चुराने वाले, आत्म प्रशंसक, गुणों को न सहने वाले (जरतुहा), अपकार करने वाले, कष्ट में व्याकुल होने वाले, क्रोधपूर्ण, अत्यधिक बोलने वाले, दुर्जनों के साथ रहने वाले, सर्वलोकनिन्दित, चुगुलखोर, परसन्तापी, प्रणयभङ्ग करने वाले, अपने कष्ट को कहने वाले, अपने स्वामी से विश्वासघात करने वाले, आत्मवञ्चक, जिह्नोपस्थ में आसक्त, चोर, पशु चेष्टा वाले, अकारण द्वेष, हास, क्लेश एवं क्रोध करने वाले, दुस्साहसी, मार्मिक परिहास करने वाले, कामुक, निर्लज्ज, झूठे एवं पापपूर्ण कार्यों के लिए उत्तेजित करने वाले, असूया, मद, मात्सूर्य, दम्भ, अहङ्कार से युक्त, ईर्ष्या, पारुष्य, पैशुन्य, कृपणता एवं क्रोध से युक्त मनवाले, अधीर, दुखी, भीरु, अशक्त, व्याकुल, अविकसित बुद्धि, मन्दबुद्धि, मूढ़, चिन्ताकुल, तृष्णा, लोभ से युक्त, दीन, असन्तोषी, सबसे माँगने वाले, बहुभोजी, कपटी, भ्रम फैलाने वाले, कुटिल, भक्ति, श्रद्धा, दया, शान्ति और धर्माचार से हीन, माता, पिता गुरुप्राज्ञ के सद्वचनों की हँसी उड़ाने वाले, कुलद्रव्यों के प्रति वीभत्स, गुरुसेवा का अभिमान करने वाले, स्त्रीद्वेषी, समयाचार से भ्रष्ट, गुरु से शापित आदि- इस प्रकार के दुर्गुणयुक्त व्यक्ति को हे कुलेश्वरि! गुरु शिष्य न बनाये।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुलार्णव के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

कुलार्णव के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें