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कुलार्णव • अध्याय 13 • श्लोक 14
अत्रिनेत्रः शिवः साक्षादचतुर्बाहुरच्युतः । अचतुर्वदनो ब्रह्मा श्रीगुरुः कथितं प्रिये ॥ नरवदृश्यते लोके श्रीगुरुः पापकर्मणा । शिववद् दृश्यते लोके भवानि पुण्यकर्मणा ॥ श्रीगुरुं परमं तत्त्वं तिष्ठन्तं चक्षुरग्रतः । मन्दभाग्या न पश्यन्ति ह्यन्याः सूर्यमिवोदितम् ॥
श्री गुरुदेव का ब्रह्मा, विष्णु, शिवत्त्वरूप - हे प्रिये! शिव त्रिनेत्रहीन होकर, विष्णु चतुर्भुजाओं से हीन होकर और ब्रह्मा चतुर्मुखों से हीन होकर साक्षात् 'श्रीगुरु' कहलाते हैं। पाप कर्मों के कारण पापियों को श्रीगुरु मनुष्य के समान और पुण्य कर्मों के कारण पुण्यात्माओं को श्रीगुरु शिव के समान संसार में दिखाई देते हैं। आँखों के सामने श्रीगुरु परम तत्त्व स्वरूप विद्यमान है, किन्तु भाग्यहीन लोग उन्हें देख नहीं पाते, जैसे अन्धे उदय हुये सूर्य को नहीं देखते।
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