मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
कुलार्णव • अध्याय 13 • श्लोक 15
गुरुः सदाशिवः साक्षात् सत्यमेव न संशयः । शिव एव गुरुनों चेद्भुक्ति मुक्ति ददाति कः ॥ सदाशिवस्य देवस्य श्रीगुरोरपि पार्वती । उभयोरन्तरं नास्ति यः करोति स पातकी ॥ देशिकाकृतिमास्थाय पशोः पाशानशेषतः । छित्त्वा परं पदं देवि नयत्येनमतो गुरुः ॥ सर्वानुग्रहकर्तृत्वादीश्वरः करुणानधिः । आचार्यरूपमास्थाय दीक्षया मोक्षयेत् पशून् ॥
गुरु साक्षात् सदाशिव हैं, यह सत्य है, इसमें सन्देह नहीं। गुरु शिव ही न हो तो, तो भुक्ति और मुक्ति को कौन देता? भगवान् सदाशिव और श्री गुरु-इन दोनों में कोई अन्तर नहीं है। जो उनमें अन्तर समझता है, वह पापी है। देशिक की आकृति को धारण कर पशु के समस्त पाशों को काट कर वे उसे परम पद को पहुँचाते हैं, अतः 'गुरु' कहलाते हैं। दयानिधि ईश्वर सब पर अनुग्रह करने के लिये 'आचार्य' का रूप धारण कर दीक्षा द्वारा पशुओं का मोक्ष करते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुलार्णव के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

कुलार्णव के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें