पाशच्छेदं वेधदीक्षां पशुग्रहणमेव च ।
त्रिविधं यो विजानाति स गुरुः परमो मतः ॥
पाशच्छेद (पशु स्तम्भ), २. वेध दीक्षा, ३. पशुमहण (पशुत्वहन) - इन तीन को जो जानता है वह श्रेष्ठ गुरु है।
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