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कुलार्णव • अध्याय 13 • श्लोक 7
गुरुध्यानस्तुतिक थादेवार्चावन्दनोत्सुकम् ॥ गुरुदैवतसम्भक्तं कामिनीपूजकं परम् । नित्यं गुरुसमीपस्थं गुरुसन्तोषकारकम् ॥ मनोवाक्तनुभिर्नित्यं परिचर्या समुद्यतम् । गुर्वाज्ञापालकं देवि गुरुकीर्त्तिप्रकाशकम् ॥ गुरुवाक्यप्रमाणज्ञं गुरुशुश्रूषणे रतम् । चित्तानुवर्त्तिनं प्रेष्यकारिणं कुलनायिके ॥ जातिमानधने गर्ववर्जितं गुरुसन्निधौ । निरपेक्षं गुरुद्रव्ये तत्प्रसादाभिकाइक्षिणम् ॥ कुलधर्मकथायोगियोगिनीकौलिकप्रियम् । कुलार्चनादिनिरतं कुलद्रव्याजुगुप्सकम् ॥ जपध्यानादिनिरतं मोक्षमार्गाभिका‌ङ्क्षिणम् । कुलशास्त्रप्रियं देवि पशुशास्त्रपराङ्‌मुखम् । इत्यादिलक्षणोपेतं गुरुः शिष्यं परिग्रहेत् ॥
गुरु के ध्यान, स्तुति, कथा और देवता की पूजा बन्दना में उत्सुक, गुरु दैवत में समान भक्ति रखने वाले, कुल स्त्री पूजक, नित्य गुरु के समीप रहने बाले, गुरु को सन्तुष्ट करने वाले, मन, वचन, शरीर से नित्य सेवा में तत्पर, गुरु आज्ञा का पालन करने वाले, गुरु कीर्ति को फैलाने वाले, गुरु वाक्य को प्रमाण मानने वाले, गुरुसेवा में तत्पर, मनोनुकूल, सेवक के सामान गुरु का कार्य करने वाले, गुरु के समक्ष जाति, मान एवं धन में गर्व न करने वाले, गुरुद्रव्य से निरपेक्ष, गुरु प्रसाद के अभिलाषी, कुल धर्म कथा और योग-योगिनी कौलिकों को चाहने वाले, कुलपूजा में लगे हुए और कुल द्रव्य का गोपन करने वाले, जप व ध्यानादि में तत्पर, मोक्षमार्ग के अभिलाषी, कुलशास्त्र को मानने वाले और पशुशास्त्र से विमुख आदि- इस प्रकार के लक्षणों से युक्त व्यक्ति को शिष्य बनाए।
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