हे प्रिये! दुष्ट वंश में उत्पन्न, गुणहीन, कुरूप, परशिष्य, पाखण्डी, नपुंसक, घमण्डी, अधिकाङ्ग, विकृताङ्ग, पंगु, अन्ध बधिर, मलिन, रोगी, उत्सृष्ट, दुर्मुख, मनमाने वस्त्र पहनने वाले, अङ्ग, चेष्ठ, गति, भाषण एवं वीक्षण से विचार प्रकट करने वाले, निद्रा, तन्द्रा एवं जड़तादि से युक्त, आलसी, धूतादि व्यसनी, सदैव द्वार, स्तम्भादि या दिवाल के पीछे छिपने वाले, अन्तर्भक्ति से युक्त किन्तु चन्दनादि बाह्य चिन्हों को न करने वाले, क्षुद्र, बाह्य भक्ति से हीन, मिथ्यावादी, स्तब्ध, शठ (चतुर), धन, स्त्री की शुद्धि से रहित, विधि निषेध को न मानने वाले व्यक्ति को शिष्य न बनाए।
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