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कुलार्णव • अध्याय 13 • श्लोक 3
दुष्टवंशोद्धवं दुष्टं गुणहीनं विरूपिणम् । परशिष्यश्च पाषण्डं षण्डं पण्डितमानिनम् ॥ हीनाधिकविकाराङ्ग विकलावयवान्वितम् । प‌ङ्गुमन्यञ्च बधिरं मलिनं व्याधिपीडितम् ॥ उत्सृष्टं दुर्मुखश्चापि स्वेच्छावेशधरं प्रिये । दुर्विकाराङ्गचेष्टादिगतिभाषणवीक्षणम् निद्रातन्द्राजडालस्यद्यूतादिव्यसनान्वितम् । कपाटकुड्यस्तम्भादौ तिरोहिततनुं सदा । अन्तर्भक्तिकरं क्षुद्रं बाह्य भक्तिविवर्जितम् ॥ व्यलीकवादिनं स्तब्धं प्रोषितं प्रेषकं शठम् । धनस्त्रीशुद्धिरहितं निषेधविधिवर्जितम् ॥
हे प्रिये! दुष्ट वंश में उत्पन्न, गुणहीन, कुरूप, परशिष्य, पाखण्डी, नपुंसक, घमण्डी, अधिकाङ्ग, विकृताङ्ग, पंगु, अन्ध बधिर, मलिन, रोगी, उत्सृष्ट, दुर्मुख, मनमाने वस्त्र पहनने वाले, अङ्ग, चेष्ठ, गति, भाषण एवं वीक्षण से विचार प्रकट करने वाले, निद्रा, तन्द्रा एवं जड़तादि से युक्त, आलसी, धूतादि व्यसनी, सदैव द्वार, स्तम्भादि या दिवाल के पीछे छिपने वाले, अन्तर्भक्ति से युक्त किन्तु चन्दनादि बाह्य चिन्हों को न करने वाले, क्षुद्र, बाह्य भक्ति से हीन, मिथ्यावादी, स्तब्ध, शठ (चतुर), धन, स्त्री की शुद्धि से रहित, विधि निषेध को न मानने वाले व्यक्ति को शिष्य न बनाए।
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