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कुलार्णव • अध्याय 13 • श्लोक 8
श्रीगुरुः परमेशानि शुद्धवेशो मनोहरः । सर्वलक्षणसम्पन्नः सर्वावयवशोभितः ॥ सर्वागमार्थतत्त्वज्ञः सर्वमन्त विधानवित् । लोकसम्मोहनकरो देववत् प्रियदर्शनः ॥ सुमुखः सुलभः स्वच्छो भ्रमसंशयनाशकः । इङ्गिताकारवित् प्राज्ञ ऊहापोहविदुज्ज्वलः ॥ अन्तर्लक्ष्यो बहिर्दृष्टिः सर्वज्ञो देशकालवित् । आज्ञासिद्धिस्त्रिकालज्ञो निग्रहानुग्रहक्षमः ॥ वेधको बोधकः शान्तः सर्वजीवदयापरः । स्वाधीनेन्द्रियसञ्चारषड्वर्गविजयक्षमाः ॥
गुरु के लक्षण हे परमेशानि! शुद्धवेषधारी, मनोहर, सर्वलक्षण, सम्पन्न, सर्वाङ्गपूर्ण, सभी आगमों के तत्त्वार्थ के ज्ञाता, सभी मन्त्रों के विधान के ज्ञाता, लोक को सम्मोहित करने वाले, देवस्वरूप, प्रियदर्शन, सुमुख, सुलभ, स्वच्छ, भ्रम, संशयनाशक, इङ्गित और आकार के प्राज्ञ, ऊहापोह के विशेषज्ञ, अन्तर्मुखी होते हुये भी बहिदृष्टि रखने वाले सर्वश, देश-काल के ज्ञाता, आज्ञासिद्ध, त्रिकालज्ञ, निग्रह-अनुग्रह में समर्थ, बेधड़क, बोधक, शान्त, सभी जीवों पर दया करने वाले, जितेन्द्रिय, षड् वर्गों को जय करने में समर्थ, व्यक्ति को गुरु बनाना चाहिए।
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