गुरु के लक्षण हे परमेशानि! शुद्धवेषधारी, मनोहर, सर्वलक्षण, सम्पन्न, सर्वाङ्गपूर्ण, सभी आगमों के तत्त्वार्थ के ज्ञाता, सभी मन्त्रों के विधान के ज्ञाता, लोक को सम्मोहित करने वाले, देवस्वरूप, प्रियदर्शन, सुमुख, सुलभ, स्वच्छ, भ्रम, संशयनाशक, इङ्गित और आकार के प्राज्ञ, ऊहापोह के विशेषज्ञ, अन्तर्मुखी होते हुये भी बहिदृष्टि रखने वाले सर्वश, देश-काल के ज्ञाता, आज्ञासिद्ध, त्रिकालज्ञ, निग्रह-अनुग्रह में समर्थ, बेधड़क, बोधक, शान्त, सभी जीवों पर दया करने वाले, जितेन्द्रिय, षड् वर्गों को जय करने में समर्थ, व्यक्ति को गुरु बनाना चाहिए।
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