पिण्डं पदं तथा रूपं रूपातीतं चतुष्टयम् ।
यो वा सम्यग्विजानाति स गुरुः कथितः प्रिये ॥
१. पिण्ड, २. पद, ३. रूप, ४. रूपातीत - इन चारों को जो भले प्रकार से जानता है, हे प्रिये! वह गुरु कहा गया है।
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