शिवादिगुरुपर्यन्तं पारम्पर्यक्रमेण यः ।
अवाप्ततत्त्वसम्भारः स गुरुर्नापरः प्रिये ॥
शिव से गुरु तक की परम्परा के क्रम से तत्त्वसम्भार का जो ज्ञाता है, हे प्रिये! वहीं श्रेष्ठ गुरु है।
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