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कुलार्णव • अध्याय 13 • श्लोक 63
यथा दीप्तानलः काष्ठं शुष्कमाईच्च निर्दहेत् । तथा गुरुकटाक्षस्तु शिष्यपापं दहेत् क्षणात् ॥
जैसे प्रज्वलित अग्नि सूखी और गीली लकड़ी को क्षण भर में भस्म कर देती है, वैसे ही गुरु (कृपा) का कटाक्ष शिष्य के पाप को क्षण भर में नष्ट कर देता है।
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