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कुलार्णव • अध्याय 13 • श्लोक 46
ये दत्त्वा सहजानन्दं दरन्तीन्द्रियजं सुखम् । सेव्यास्ते गुरवः शिष्यैरन्ये त्याज्याः प्रतारकाः ॥
जो सहजानन्द देकर इन्द्रियजन्य सुख की आसक्ति को दूर करते हैं, वही गुरु सेवनीय हैं, अन्यों को ठग समझकर शिष्य त्याग दें।
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