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अध्याय 48 — अथ पुष्यस्नानाध्यायः
बृहत्संहिता
86 श्लोक • केवल अनुवाद
इस संसार में प्रजारूप वृक्ष का मूल स्वरूप राजा है। यतः उस राजा का विषात होने से प्रजाओं का अशुभ और संस्कार से शुभ होता है; अतः राजा के शुभवृद्धि के लिये चिन्ता करनी चाहिये ।
जो शान्ति इन्द्र के लिये ब्रह्माजी ने बृहस्पति से कही थी, उसी को पाकर वृद्धगर्गाचार्य ने भागुरि से जिस तरह कही, उसी तरह उस शान्ति को सुनो।
ज्यौतिषि और पुरोहित के द्वारा राजा को पुष्य स्नान कराना चाहिये। इससे अधिक पवित्र और सभी उत्पातों को नाश करने बाला दूसरा कोई उपाय नहीं है।
श्लेष्मातक (लसौड़ा), अक्ष (बहेड़ा), कण्टक (खैर आदि), कटु, तिक्त (निम्बू आदि) और दुर्गन्धियुत वृक्षों से रहित, उल्लू, गिद्ध आदि अशुभकारक पक्षियों से रहित,
नूतन वृक्ष, गुल्मलताओं के समुदाय से युत, पत्र, पल्लव, सुन्दर, मधुर (स्वादुयुत) वृक्षों के समूह से युत वन के समीप में राजा को पुष्य स्नान करना चाहिये।
मुर्गा, तीतर, तोता, मयूर, शतपत्र (कठफोरवा), चाप (नीलकण्ठ), हारीत (हारिल), क्रकर (करील, चकोर, कपिङ्गल, वङ्गुल, कबूतर, ओकण्ठ)
इन पक्षियों के शब्दों से युक्त पुष्पों के रसास्वादन से मत्त प्रमर, श्रेष्ठ कोकिल आदि और अन्य सुन्दर पक्षियों के शब्दों से युत वन के समीम् शुद्ध पुण्यभूमि में पुष्यस्नान करना चाहिये।
जलचर पक्षी रूप नखों से क्षत, दृष्टि और मन को आनन्ददायक नदी रूप कामिनियों के तटरूप सुन्दर जंपाओं पर (सुन्दर नदीतट पर) पुष्यस्नान करना चाहिये ।
उड़ते हुये हंसरूप छत्र बाले कारण्डव, कुरर और सारस पक्षियों के ध्वनिरूप गाने से युत, खिले हुये नीलकमलरूप नेत्रों से युतः अत एव इन्द्र के समान कान्ति वाले सरोबर के तौर पर स्नान करना चाहिये।
खिले हुए कमलरूप मुख वाली, राजहंस के मधुर शब्दरूप वाक्य वाली और कमल के कली रूप ऊँचे स्तन वाली पुष्करिणी रूप त्री के जंचा (तट) पर पुष्य- स्नान करना चाहिये।
गायों के जुगाली करने से गिरे हुये फेन और गोबर खुरों से ताडित जहाँ पर हो तथा उत्पन हुए बछड़ों के हुङ्कार और कूदना फाँदना रूप उत्सवयुत गोष्ठ स्थान में पुष्यस्नान करना चाहिये।
अथवा सकुशल आये हुये रत्नपुतनयों से व्याप्त तथा भने निघुल (समुद्रफात) पूयों के ऊपर लीन जलचर और सफेद पक्षियों से चित्रित समीप भाग है जिसका, ऐसे समुद्र के शीर में पुध्यस्नान करना चाहिये ।
अथवा जहाँ पर शान्ति से क्रोध की तरह हरिणियों से सिंह जीत लिया गया हो अर्थात् हरिणी और सिंह साथ-साथ रहते हों तथा अभयदान पाकर पक्षी और मृग के बच्चे निर्भय घूमते हैं, ऐसे मुनियों के आश्रम में पुष्यस्नान करना चाहिये।
अथवा करधनी, पायजेब और भारी जंघाओं के भार से मन्द गति वाली तया कोयल को तरह मधुर बोलने वाली मृगनयना खियों से शोभित गृह में पुष्यस्नान करना चाहिये।
अथवा पवित्र देवस्थान, तीर्थ, जलाशय, उपवन, सुन्दर देश, पूर्व या उत्तर तरफ नोचो भूमि पर प्रदक्षिण क्रम से जहाँ जल बहता हो, ऐसे स्थान में पुष्यस्नान कराना चाहिये ।
राख, कोयला, हट्टी, ऊपर, भूसी, केश, गड्ढा हो तथा केंकड़ा, बिल में रहने वाला जन्तु, चूहा और दोमक आदि से रहित,
अन्तःसार बाली, सुगन्धयुत, निर्मल, मधुर और समभूमि विजय के लिए होती है। सेनाओं के निवास के लिए भी पूर्वोक्त भूमि युक्तिपूर्वक प्रयोग करनी चाहिये।
दैवज्ञ, मन्त्री और याजक लोग रात में पुर से निकल कर पूर्वोक्त स्थान के पूर्व, उत्तर या ईशान कोण में
नम्र होकर पुरोहित को खोर, अक्षत, दधि और पुष्यों के द्वारा बलि देनी चाहिये इसके बाद मुनियों द्वारा कथित आवाहन मन्त्र पढ़ना चाहिये ।
जो देवता इसमें पूजा के इच्छुक हैं, ये दिशा, नाग, ब्राह्मण और अन्य अंश भोगो गण सभी यहाँ आगमन करें।
इस तरह पुरोहित सबका आवाहन करके यक्ष्यमाण रूप से प्रार्थनापूर्वक भोले- 'आप सब आगामी प्रातःकाल में पूजा पाकर राजा को शान्ति
आवाहित देवता आदि की पूजा करके सभी (दैवज्ञ, मन्त्री, याजक) वह रात्रि बहीं व्यतीत करें। बाद में रात्रि में जो स्वप्न दिखाई दे, तदनुसार ही शुभाशुभ फल जानना चाहिये, इसको जानने की विधि यात्रा नामक ग्रन्थ में कही गई है।
दूसरे दिन प्रात:काल उस पृथ्वी प्रदेश में जाकर उक्त गुणों से युत सामान एकत्रित करें। यहाँ पर मुनि (वृद्ध गर्ग) से कथित ये बक्ष्यमान श्लोक हैं।
पूर्वोक्त शुभ लक्षणपुत भूप्रदेश में एक मण्डल बनाकर अनेक प्रकार के रत्नों के समुदाय से युत पृथ्वी की और बहुत तरह के स्थानों की कल्पना करे।
बाद में पुरोहित प्राधान्य क्रम से नाग, यक्ष, देव, पितर, गन्धर्व, अप्सरा, मुनि और सिद्धों की स्थापना को तथा अधिनी आदि सब नक्षत्रों के साथ ग्रह, ब्राह्मी आदि
गन्धर्व, अप्सरा, मुनि और सिद्धों की स्थापना को तथा अधिनी आदि सब नक्षत्रों के साथ ग्रह, ब्राह्मी आदि माताओं के साथ स्ट्र कार्तिकेय,
ब्राह्मी आदि माताओं के साथ स्ट्र कार्तिकेय, विष्णु, विशाखा, लोकपाल और देवताओं की स्त्री (इन्द्राणी, गौरी, लक्ष्मी आदि) को मन को प्ररात्र करने वाली सुगन्धियों से युक्त नाना प्रकार के वणों से बना कर विद्वान् मुगन्धित द्रव्य,
माला, चन्दन, भोज्यान, नाना प्रकार के फल, मूल, मांस, नाना प्रकार के चित्ताहादक पान पस्तु, मद्य, दुग्ध, आसव आदि से पूजा करे।
इसके बाद इस यज्ञ में अभीष्ट देवताओं की पूजन विधि बताते हैं। पात्रा नामक पुस्तक के ग्रहयज्ञ प्रकरण में ग्रहों की पूजन विधि जो बताई गई है,
उसी तरह यहाँ पर भी ग्रहों की पूजा करनी चाहिये। मांस, भाउ, मद्य आदि से पिशाच, दैत्य और दानवों की पूजा करनी चाहिये।
अभ्यञ्जन (स्निग्ध पदार्थ), वाग्जल, तिल, मांस और भात से पितरों को; साम तया यजुर्वेदों के मन्त्र, सुमन्य द्रव्य, धूप और मालासों से मुनियों कौ; अश्लेषक (अमिश्रित) वर्ण और जिमधुर (मधु, पूत और शर्करा) से सों की;
धूप और मालासों से मुनियों कौ; अश्लेषक (अमिश्रित) वर्ण और जिमधुर (मधु, पूत और शर्करा) से सों की; धूप, घृत, हवन, माला, रत्न, स्तीत्र और प्रणामों से देवताओं की, सुगन्य द्रव्य, माला और सुन्दर गन्धों से गन्धर्व तथा अप्परराओं की एवं समस्त वर्णपुत वलियों
शेष ( यज्ञ आदि) की पूजा करनी चाहिये। पूजन के बीच-बीच में सबको कुङ्कम से रक किया हुआ सूत्र, परख, ध्वजा, भूषण और पज्ञोपवीत देना चाहिये ।
मण्डल के पश्चिम या दक्षिण भाग में वेदी बना कर उस पर अग्निस्थापन करके सामग्रियों को एकत्रित करे। लम्बे, अच्छिन्न और गर्भरहित कुशाओं को लावे ।
खीर, घृत, अक्षत, दधि, मनु, सरसों, सुगन्ध द्रव्य, पुष्प, धूप, गोरोचन, कज्जल, तिल, स्व ऋतु के उत्पत्र मधुर फल-यह सामग्री है।
इस सामग्री में प्रत्येक के साथ- साथ घृत और खीर का राराष (मिट्टी का पात्र) देवे। इनसे वेदी के पक्षिम, भाग में पूरा करे, क्योंकि यह पुष्यस्नान की येदी होती है।
इसके चारों कोणों में दृढ़, सफेद सूत्र से वेष्टित गले वाले, दूध वाले, वृक्ष के पालव फलों से ढके चार कलशों को स्थापित करे।
उनको पुष्यस्नान की ओषधियों से मिश्रित जल से, रत्नों से और गर्ग महर्षि के द्वारा प्रतिपादित पुष्यस्नान के द्रव्यों से परिपूर्ण करे।
ज्यौतिष्मती ( कंगनी मालकाकणों), प्रायमाणा (चिरायते का फल), अभया (हरें हरीर), अपराजिता (विष्णुक्रान्ता), जीवा (जोवन्ती डोटी), विबेरारी ( गाँठ), पाठा ( पाद = पारि)
समद्रा ( रक्तमशिष्ठा पसरन), विजया (भंग), सहा (मुद्भषणों बनमूड़), सहदेवी (सहदेई), पूर्णकोशा (नागरमोथा), शतावरी, अरिहिका (रोठा), शिया (शमी), भद्रा (बला)-इन औषधियों को पूर्व स्थापित चारो कालगों में डाल दे।
ब्राह्मी, क्षेमा (काष्ठगुग्गुल), अजा (औषधिविशेष), सब प्रकार के बीज, काछनो ( हलदी हरदो, 'निद्रा काशनी पीता हरिद्रा वरवर्णनो'त्यमरः), अन्य मङ्गल द्रव्य ( दधि, अक्षत, पुष्प आदि)-इन द्रव्यों में जितने की प्राप्ति हो, उतने ही लेना चाहिये। सब औषधि, सब रस
त्न, सब सुगन्धद्रव्य, बेल, विकडूत ( कंटाप कंपी), प्रशस्त औषधि (जया, जयन्ती, जोवन्सी, जौवपुत्रिका, पुनर्नवा, विष्णुक्रान्ता, चक्राङ्गा, चाराही और लक्षणा), सुवर्ण आदि धातु, माङ्गलिक ओषधि ( गोरोचन, सरसों, दूवां, हस्तिमद आदि) सब द्रव्यों को पूर्वस्थापित कलशों में डाल दे।
पहले वृद्ध होकर मरे हुये, प्रशस्त लक्षणों ( ६१ में अध्याय में कथित लक्षणों) से पुत बैल का चर्म लेकर पूर्वाभिमुख करके बिछावे।
इसके बाद लोहित वर्ष वाले योद्धा बोल का छिद्ररहित चर्म विज्ञावे, बाद में तृतीय सिंद का धर्म और इसके बाद चतुर्थ
चतुर्थ व्याज का चर्म विद्याचे पुष्य नक्षत्रात चन्द्र के समय शुभ मुहूर्त में वेदी के ऊपर इन चारो चमड़ों को विद्याये ।
चमड़े के ऊपर सोना, चाँदी, ताँचा या दुर्घले वृक्ष का बना हुआ सुन्दर आसन विद्यावे। इस भद्रासन की ऊँचाई तीन प्रकार (एक हाथ पादाधिक हस्त तीस अंगुल और देख हाथ) की होनी चाहिये।
प्रथम माण्डलिक राजा का शुभ करने वाला, द्वितीय विजपेच्छु राजा का हित करने बाला और तृतीय चक्रवर्ती राजा बनने की इच्छा रखने बाले राजा का शुभकारी होता है।
उस भद्रासन के मध्य में सुवर्ण देकर मन्त्री, विश्वस्त बन्धु, पुरोहित, दैवज्ञ और शुभ (जयराज, सिंहराज, बन्धुराज, व्याघ्रराज आदि नामों से युत पुरवासियों के साथ प्रसत्र चित्त होकर राजा बैठे।
बन्दिजन, पुरवासी तथा ब्राह्मणों के द्वारा उद्घोषित पुण्याह शब्द, वेदध्वनि, मृदङ्गद्ध, शङ्ख और तुरही के मङ्गल शब्दों से नष्ट हो गया है अनिष्ट जिसका, ऐसा राजा उस आसन पर बैठे।
नथीन रेशमी धरख पहने हुये और कर लिया है बलि और पूजा जिसने, ऐसे राजा को कम्बल से आध्यादित करके पुरोहित पूर्ण कलम से अभिषेक करे ॥
आठ, अट्ठाईस, एक सौ आठ या आठ सौ. कलश का प्रमाण है। अधिक-अधिक प्रमाण के कलश अधिक-अधिक गुण देते हैं। इस घृत के अभिषेक में मुनि (वृद्धगर्ग) के द्वारा प्रतिपादित आगे मन्त्र हैं।
भूत तेज है, घृत प्रकृष्ट पाप का नाश करने वाला है। घृत देवताओं का आहार है। पूत में लोक (भू: आदि) स्थापित हैं, भौम (चराचरोद्भव),
आन्तरिक्ष (उल्का, निर्यात, पवन, परिवेके, गन्धर्वपुर, इन्द्रचाप आदि से उत्पत्र), दिव्य (ग्रहनक्षत्रोद्भव) जो पाप तुम्हारे ऊपर आये हों, ये सब पी के स्पर्श से नाम को प्राप्त हों।
इसके बाद पुरोहित राजा के शरीर पर से कम्बल उतार कर फल-फूलों के साथ पुष्यस्थानीय जल से आगे कथित मन्त्र के द्वारा अभिषेक करे।
सभी देवता तुम्हारा अभिषेक करें-सिद्ध, पुरातन देव (ब्रह्मा, विष्णु, शिव ), साध्य, वायु के समुदाय, आदित्य, वसु, रुद्र, वैद्यों में श्रेष्ठ दोनों अश्विनीकुमार,
अदिति, देवमाता, स्वाहा, सिद्धि, सरस्वती, कीर्ति, लक्ष्मी, घृति, श्री, सिनीवाली (दृश्यचन्द्रा ),
देवमाता, स्वाहा, सिद्धि, सरस्वती, कीर्ति, लक्ष्मी, घृति, श्री, सिनीवाली (दृश्यचन्द्रा ), कुहू (अदृश्यचन्द्रा अमावस्या), दनु, सुरसा, विनता, कडू, देवपत्री
देवमाता, दिव्य अप्सरायें- ये सब तुम्हारा अभिषेक करें। अश्विनी आदि नक्षत्र, मुहूर्त, पक्ष,
अहोरात्र को सन्धि, संवत्सर, सूर्यादि सात ग्रह, कला, काष्ठा, क्षण, लव-ये सब काल के शुभ अवयव तुम्हारा अभिषक करें।
ब काल के शुभ अवयव तुम्हारा अभिषक करें। ये सब तथा अन्य भी वेदव्रर्तपरायण, शिष्य और खियों के साथ तपस्यीगण तुम्हारा अभिषेक करें।
मान पर चलने वाले देवतागण, मनु, समुद्र, नदी, प्रधान नाग, कित्रर, वैखानस, श्रेष्ठ ब्राह्मण, आकाशमार्ग से गमन करने वाले, त्रियों के साथ सप्तर्षि गण,
सभी ध्रुवस्थान, मरीचि, अत्रि, पुलह, पुलस्त्य, क्रतु, अङ्गिरा, भृगु, सनत्कुमार, सनक, सनन्दन, सनातन, दक्ष, जैगीषष्य, भगन्दर, एकत, द्वित, प्रित, जायालि, कश्यप, दुर्वाररा, दुर्विनीत,
, दुर्वाररा, दुर्विनीत, कण्व, कात्यायन, मार्कण्डेय, दीर्घतप, शुनःशेप, विदूरथ,
दीर्घतप, शुनःशेप, विदूरथ, ऊर्व, संवर्तक, च्यवन, अत्रि, पराशर, द्वैपायन (व्यास), यवक्रीत, भाइयों के साथ देवराज (इन्द्र)
भाइयों के साथ देवराज (इन्द्र), पर्वत, वृक्ष, लता, पुण्यगृह, प्रजापति, दिति, गौ
गौ, विश्व की मातायें, दिव्य वाहन, चराबर समस्त लोक, अग्नि, पितर, तारा, मेप, आकाश
दिशा, जल- ये सब तथा अन्य भी पवित्र कीर्ति वाले, सभी
सभी उत्पातों का नाश करने वाले, पवित्र गल से जिस तरह प्रसम चित
चित होकर इन्द्र का अभिषेक किया गया था, उसी तरह तुम्हारा अभिषेक करें।
इन मन्त्रों के अतिरिक्त अथर्वकल्प में कथित मन्त्रों से, रुद्रगण ('एकदशानुवाका रुद्राः' ), कौष्माण्ड ( 'घडनुवाका मरुदणाः'), महारोहिण और कुबेरहदय नामक ऋचा से अभिषेक करें।
स्नान करके राजा आपोहिष्या इत्यादि तीन ऋचाओं और हिरण्यवर्णा इत्यादि चार ऋचाओं से अभिमन्त्रित यत्र पहने।
इसके बाद पवित्र होकर राजा देवता, गुरु और ब्राह्मणों की पूजा करके छत्र, ध्वज और खड्ग की पूजा करे; तत्पश्चात् अभीष्ट देवता की पूजा करे।
आयुष्यं, वर्चस्वं, रायस्पोष आदि छः ऋचाओं से अभिमन्त्रित विजय करने वाला नथीन आभूषण राजा पहने।
बाद में द्वितीय वेदी पर जाकर राजा चमड़े के ऊपर बैठे, चमड़ों को आगे दी गई विधि के अनुसार ऊपर-ऊपर रक्खे।
जैसे सबसे पहले बैल का, बाद में बिल्ली का, इसके बाद काले मृग का, इसके बाद हरिण का, इसके बाद सिंह का और अन्त में प्यान का चमड़ा रक्खे।
पुरोहित मुख्य स्थान (दक्षिण स्थान में लकड़ी, तिल, गृह आदि से स, इद, विष्णु और सम्बन्धी ऋचा पढ़ कर अग्नि में आहुति है।
दैवज्ञ इन्द्रध्वज में कथित अग्नि के लक्षण को बोले, सबकी समाप्ति के अनन्तर पुरोहित हाथ जोड़ कर बोले ।
हे देवगण! आप सब राजा द्वारा प्रदत्त पूजा को प्राप्त कर उनको महान् सिद्धि देकर फिर आगमन के लिये गमन करें।
इसके बाद राजा बहुत प्रकार के धनों से दैवज्ञ और पुरोहित की पूजा करे तथा अन्य दक्षिणा देने के लायक श्रोत्रिय आदि की भी यथोचित पूजा करे।
प्रजाओं को अभयदान देकर बध्य स्थानगत पशु (छाग) आदि को छोड़कर अभ्यन्तर (राजा के शरीर या अन्तःपुर) में जिन्होंने अपराध किया है, उनके सिवाय समस्त बन्धन स्थानस्थित पुरुषों को मुक्त करे।
प्रत्येक पुष्य नक्षत्र में किया हुआ यह स्नान सुख, यश और धन की वृद्धि करने बाला होता है। पुष्य नक्षत्र को छोड़कर अन्य नक्षत्र में यथाविधि यह स्नान करने से आधा फल देने भाला होता है। पर पुष्य नक्षत्रयुत पूर्णिमा के दिन का यह स्नान सर्वोत्कृष्ट है।
राज्य में किसी प्रकार का उत्पात या उपसर्ग (उपद्रव) होने पर तथा केतु का दर्शन होने पर पुष्यस्नान करना चाहिये।
इस लोक में इस तरह का कोई उत्पात नहीं है, जो इस स्नान से नष्ट न हो और ऐसा कोई माङ्गलिक कार्य नहीं है, जो इससे अधिक फल देने वाला हो।
महाराजाधिराज पद की और पुत्र की इच्छा करने वाले राजा को उसके प्रथम अभिषेक में भी यही विधि प्रशस्त है।
बहुत बड़ी कीर्ति वाले बृहस्पति ने इन्द्र के लिये यह स्नान कहा था। यह स्नान आयु और प्रजा की वृद्धि करने वाला तथा सौभाग्य प्रदान करने वाला है।
जो राजा इस पूर्वोक्त विधि से हाथी और घोड़ों को भी अभिषेक कराता है, रोग से मुक्त होकर उसके वे हाथी-घोड़े परम सिद्धि प्राप्त करते हैं।
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