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बृहत्संहिता • अध्याय 48 • श्लोक 13
क्षमया क्रोध इव जितः सिंहो मृग्याभिभूयते येषु । दत्ताभयखगमृगशावकेषु तेष्वाश्रमेष्वथवा ॥
अथवा जहाँ पर शान्ति से क्रोध की तरह हरिणियों से सिंह जीत लिया गया हो अर्थात् हरिणी और सिंह साथ-साथ रहते हों तथा अभयदान पाकर पक्षी और मृग के बच्चे निर्भय घूमते हैं, ऐसे मुनियों के आश्रम में पुष्यस्नान करना चाहिये।
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