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बृहत्संहिता • अध्याय 48 • श्लोक 8
हृदिनीविलासिनीनां जलखगनखविक्षतेषु रम्येषु । पुलिनजपनेषु कुर्याद् दृङ्मनसोः प्रीतिजननेषु ॥
जलचर पक्षी रूप नखों से क्षत, दृष्टि और मन को आनन्ददायक नदी रूप कामिनियों के तटरूप सुन्दर जंपाओं पर (सुन्दर नदीतट पर) पुष्यस्नान करना चाहिये ।
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