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बृहत्संहिता • अध्याय 48 • श्लोक 53
भीमान्तरिक्षं दिव्यं वा यत्ते कल्मषमागतम् । सर्व तदाज्यसंस्पर्शात् प्रणाशमुपगच्छतु ॥
आन्तरिक्ष (उल्का, निर्यात, पवन, परिवेके, गन्धर्वपुर, इन्द्रचाप आदि से उत्पत्र), दिव्य (ग्रहनक्षत्रोद्भव) जो पाप तुम्हारे ऊपर आये हों, ये सब पी के स्पर्श से नाम को प्राप्त हों।
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