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बृहत्संहिता • अध्याय 48 • श्लोक 9
प्रोत्प्लुतहंसच्छत्रे फुल्लेन्दीवरनयने कारण्डवकुररसारसोहीते। सरसि सहस्राक्षकान्तिधरे ॥
उड़‌ते हुये हंसरूप छत्र बाले कारण्डव, कुरर और सारस पक्षियों के ध्वनिरूप गाने से युत, खिले हुये नीलकमलरूप नेत्रों से युतः अत एव इन्द्र के समान कान्ति वाले सरोबर के तौर पर स्नान करना चाहिये।
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