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बृहत्संहिता • अध्याय 48 • श्लोक 1
अथ पुष्यस्नानं व्याख्यायते। तत्रादावेव प्रयोजनप्रदर्शनार्थमाह- मूलं मनुजाधिपतिः प्रजातरोस्तदुपघातसंस्कारात् । अशुभं शुभं च लोके भवति यतोऽतो नृपतिचिन्ता ॥
इस संसार में प्रजारूप वृक्ष का मूल स्वरूप राजा है। यतः उस राजा का विषात होने से प्रजाओं का अशुभ और संस्कार से शुभ होता है; अतः राजा के शुभवृद्धि के लिये चिन्ता करनी चाहिये ।
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