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बृहत्संहिता • अध्याय 48 • श्लोक 51
अष्टावष्टाविंशतिरष्टशतं वापि कलशपरिमाणम् । अधिकेऽधिके गुणोत्तरमयं च मन्त्रोऽत्र मुनिगीतः ॥
आठ, अट्ठाईस, एक सौ आठ या आठ सौ. कलश का प्रमाण है। अधिक-अधिक प्रमाण के कलश अधिक-अधिक गुण देते हैं। इस घृत के अभिषेक में मुनि (वृद्धगर्ग) के द्वारा प्रतिपादित आगे मन्त्र हैं।
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