रत्नानि सर्वगन्यांच बिल्वं च सविकङ्कतम् । प्रशस्तनाम्न्यश्चौषध्यो हिरण्यं मङ्गलानि च ॥
त्न, सब सुगन्धद्रव्य, बेल, विकडूत ( कंटाप कंपी), प्रशस्त औषधि (जया, जयन्ती, जोवन्सी, जौवपुत्रिका, पुनर्नवा, विष्णुक्रान्ता, चक्राङ्गा, चाराही और लक्षणा), सुवर्ण आदि धातु, माङ्गलिक ओषधि ( गोरोचन, सरसों, दूवां, हस्तिमद आदि) सब द्रव्यों को पूर्वस्थापित कलशों में डाल दे।
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