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अध्याय 1 — मध्यमाधिकारः

सूर्य सिद्धांत
70 श्लोक • केवल अनुवाद
अचिन्त्य, अनिर्वचनीय (कल्पना से परे) एवं अव्यक्त (निराकार) स्वरूप वाले, सत्व, रज, तम, गुणत्रय से रहित, (प्रकृति) स्वरूप (सगुण), समस्त सृष्टि के आधारभूत सृष्टि स्थिति विनाशरूप मूर्तित्रयात्मक उस परब्रह्म को नमस्कार है।
सत्ययुग के स्वल्पकाल शेष रह जाने पर (सत्ययुग के अन्त में) पय नामक महान्‌ असुर ने गूढ़ ज्यौतिष शास्त्र के उत्तम ज्ञान के प्रति जिज्ञासु होकर
समस्त वेदाड़ों में श्रेष्ठ ज्योतिष्पिण्डों (ग्रहों) के गति के कारणभूत (प्रतिपादक) परम पवित्र एवं भगवान्‌ सूर्य की आराधना करते हुये घोर तपस्या किया।
अनन्तर उसकी (मय की) तपस्या से सन्तुष्ट होकर ज्योतिष शास्त्र के ज्ञान रूपी वरदान की अभिलाषा रखने वाले मय दानव को अत्यन्त प्रसन्नता के साथ भगवान्‌ सूर्य ने स्वयं ग्रहों के चरित्र (ज्योतिष शास्त्र के ज्ञान) को श़दान किया।
श्री सूर्य ने कहा - मैंने तुम्हारे भाव (विचार) को समझ लिया है। तुम्हारी तपस्या से में सन्तुष्ट हूँ। अत: मैं काल के आश्रयभूत एवं ग्रहों के महान चरित्र (ग्रह, गति, युति आदि) से परिपूर्ण ज्योतिष शास्त्र के दिव्य ज्ञान को तुम्हें प्रदान करूँगा।
(मैं तुम्हें ज्योतिषशास्त्र का ज्ञान देना चाहता हूँ परन्तु) मेरे तेज को सहन करने की शक्ति किसी प्राणी में नहीं है तथा मेरे पास इतना समय भी नहीं है कि मैं ज्योतिष शास्त्र का व्याख्यान कर सकूँ। अत: मेरा यह अंशावतार पुरुष ही तुम्हें समग्र ज्योतिष शास्त्र का ज्ञान करायेगा।
इस प्रकार कहकर तथा अंशावतार पुरुष को भली भाँति आदेश देकर भगवान्‌ सूर्य अन्तर्ध्यन हो गये। अनन्तर उस अंशावतार पुरुष ने अत्यन्त विनग्र भाव से हाथ जोड़ कर खड़े हुये मय दानव से यह कहा-
पहले प्रत्येक युग में स्वयं भगवान सूर्य ने महर्षियों को जिस उत्तमज्ञान को बतलाया है उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो।
आदि (मूल) शास्त्र वही है जो पहले भगवान्‌ भास्कर (सूर्य) ने बतलाया था। केवल युगों के परिवर्तन से इस शास्त्र में काल-भेद उत्पन्न हो गये हैं।
(काल दो प्रकार का होता है) एक काल प्राणियों (सृष्टि) का संहार करने वाला तथा दूसरा गणना करने वाला होता है। कलनात्मक काल (गणना करने वाला) दो तरह का होता है पहला स्थूल होने से मूर्त संज्ञक (व्यावहारिक) और दूसरा सूक्ष्म होने से अमूर्त संज्ञक (अव्यवहारिक) कहा जाता है।
प्राण आदि मूर्त संज्ञक और त्रुटि आदि अमूर्त संज्ञक काल कहे गये हैं। ६ प्राण की एक विनाडी (पल ), ६० विनाडी (पल ) की १ नाडी, ६० नाडी (घटी ) का एक नाक्षत्र अहोरात्र कहा गया है।
३० अहोरात्र का एक मास होता है। दो सूर्योदय के मध्य का काल सावन दिन होता है।
उसी प्रकार तीस तिथियों का एक चान्द्र मास, एक सडद्क्रान्ति से दूसरी संक्रान्ति पर्यन्त (जब तक सूर्य एक राशि पर रहता है) एक सौरमास कहा गया है। बारह मासों का एक वर्ष तथा एक वर्ष का १ दिव्य दिन होता है।
देवताओं और असुरों का अहोरात्र (दिन एवं रात्रि) एक दूसरे से विपरीत क्रम से होता है। (जब देवताओं का दिन तब दैत्यों की रात्रि तथा जब देवों की रात्रि तब देत्यों का दिन होता है) छ से गुणित उन साठ अहोरात्रों के तुल्य देवों का तथा दैत्यों का एक वर्ष होता है। अर्थात्‌ ६ ५८ ६० - ३६० सौर वर्षो का एक दिव्य वर्ष होता है।
देवताओं और असुरों के वर्ष प्रमाण से १२ हजार वर्षों (१२ सहस्र दिव्य वर्षों) का एक चतुर्युग (महायुग) कहा गया है। सौरमान से दश हजार गुणित ४३२ अर्थात्‌ ४३२०००० वर्षो का एक महायुग होता है।
कृतयुगादि प्रत्येक युगों के सन्ध्या संध्यांशों से युक्त चतुर्युग का मान कहा गया है । कृतन्त्रेता-द्वापर-कलियुगों की पाद (१२०० दिव्य वर्ष ) व्यवस्था धर्मपाद के अनुरूप ही है। (अर्थात्‌ कृत (सत्य ) युग में चार, त्रेता में तीन, द्वापप मे २ तथा कलियुग में श पाद धर्म होता है । इसी के अनुरूप कृतयुग ४ पाद (४+८१२०० दिव्य वर्ष ), त्रेता तीन पाद, तथा कलियुग १ पादतुल्य (दिव्यवर्ष ) होता है।)
महायुग के मान (१२००० दिव्य वर्ष) के दशमांश को क्रम से ४, ३, २ और १९ से गुणा करने पर क्रम से कृत, त्रेता, द्राप और कलियुग का मान होता है। अपने अपने युगमान के षष्ठांश तुल्य दोनों सन्धियाँ होती है।
मूर्त (व्यावहारिक) काल प्रमाण में ७१ महायुगों (चतुर्यगों) का एक मन्वन्तर कहा गया है। एक मनु के अन्त में कृतयुग (४८०० दिव्य वर्ष) तुल्य मनु की सन्धि होती है। सन्धि काल जलप्लव कहलाता है। अर्थात्‌ एक मनु के समाप्ति और द्वितीय मनु के आरम्भ के पूर्व ४८०० दिव्य वर्षो तक पृथ्वी पर जल-प्छावन रहता है।
एक कल्प में सन्धि सहित पूर्वोक्त १४ मनु होते हैं। कल्प के आदि में कृत (सत्य) युग के तुल्य सन्धि होती है। इस प्रकार १ कल्प में सत्ययुग के समान १५ सन्धियाँ होती हैं।
इस प्रकार एक हजार महायुग का सृष्टि संहारकारक १ कल्प ब्रह्मा का एक दिन कहा गया है। इतनी ही (१ कल्प तुल्य) ब्रह्मा की रात्रि भी होती है।
पूर्वोक्त ब्रह्मा के अहोरात्र (२ कल्प) प्रमाण से सौ वर्ष (३६० x २ कल्प x १००) ब्रह्मा की परमायु होती है। ब्रह्मा की आयु का आधा भाग (५० वर्ष) बीत चुकां है। शेष आयु (५१ वें वर्ष) का यह प्रथम कल्प (दिन) है।
इस वर्तमान कल्प में सन्धियों सहित ६ मनु बीत चुके हैं। सप्तम वैवस्वत नामक मनु के भी २७ महायुग बीत चुके हैं।
वर्तमात्त अठ्ठाइसवें महायुग में कृत (सत्य) युग बीत चुका है। अत: कालमानों को एकत्र कर उनका योग कर लेना चाहिये।
ग्रह, नक्षत्र, देव, दैत्य आदि चर (जड्गम जीव-जन्तु) अचर (स्थावर वृक्ष, पर्वतादि) की रचना करने में ब्रह्मा को कल्पारम्भ से शत गुणित ४७४ दिव्य वर्ष (४७४ x १०० = ४७४०० दिव्य वर्ष) बीत गये। अर्थात्‌ कल्पारम्भ से ४७४०० दिव्य वर्ष के अनन्तर सृष्टि काल का आरम्भ हुआ है।
प्रवह नामक वायु से प्रेरित होकर ग्रह निरन्तर अत्यन्त वेग से पश्चिम दिशा में जाते हुये दिखलाई पड़ते है। परन्तु नक्षत्रों से पराभूत होते हुये अपनी-अपनी कक्षा में सभी ग्रह समान योजन पूर्व दिशा में चलते हैं (अर्थात्‌ ग्रह अपनी-अपनी कक्षा में समान गति से पश्चिम से पूर्व दिशा में भ्रमण करते हैं)।
अत: इन ग्रहों का पूर्वाभिमुख गमन ही प्रमाणित होता है। अपनी-अपनी कक्षा के अनुसार इनकी दैनिक गति भिन्न-भिन्न होती है तथा उसी (दैनिक) गति के अनुसार ग्रह राशिचक्र का भोग करते हुये भगण पूर्ण करते हैं।
शीघ्र गति वाले ग्रह अल्प काल में तथा मन्द गति वाले ग्रह अधिक काल में उन २७ नक्षत्रों का भोग करते हैं। इस प्रकार (नक्षत्रों में) भ्रमण करते हये रेवती नक्षत्र के अन्त में ग्रहों का भगण पूर्ण होता है।
६० विकला की एक कला, ६० कला का १ अंश, ३० अंश की १ राशि तथा १२ राशियों का एक भगण होता है।
पूर्वाभिमुख गमन करने वाले सूर्य-बुध और शुक्र की तथा मड्रल-शनि और गुरु के शीघ्रोच्चों की भगण संख्या ४३२०००० होती है।
एक महायुग में चन्द्रमा की भगणसंख्या ५७७५३३३६, मंगल की २२९६८३२,
बुध शीघ्रोच्च की १७९३७०६०, गुरु की ३६४२२०,
शुक्र शीघ्रोच्च की ७०२२३७६, शनि की १४६५६८,
चन्द्रोच्च की ४८८२०३, तथा पात (राहु, केतु) की विपरीत गति से (पश्चिमाभिंमुख) भगणों की संख्या २३२२३८ होती है।
एक महायुग में प्रवहवायु वश नक्षत्रों की भगण संख्या १५८२२३७८२८ होती हैं। नाक्षत्र उदय काल (नक्षत्र भगण) में से ग्रहों के अपने-अपने भगण घटाने पर शेष तत्तद ग्रहों के सावन दिन होते हैं।
एक महायुग में सूर्य और चन्द्रमा के भगणों के अन्तर तुल्य चान्द्रमास होते हैं। युगचान्द्र मास से युग सौर मास घटाने से अधिमास होते हैं।
चान्द्र दिवसों से सावन दिवसों को घटाने से शेष तिथि क्षय (अवम) होता है। सूर्य के एक उदय काल से दूसरे उदय काल पर्यन्त, भूमि का सावन दिन होता है। (पृथ्वी पर व्यवहार में आने वाला दिन होता है)।
एक महायुग में १५७७९१७८२८ सावन दिन, १६०३००००८० चान्द्र दिन (तिथियाँ ),
१५९३३३६ अधिमास, २५०८२२५२ तिथिक्षय (क्षयदिन) तथा
५१८४०००० सौरमास होते हैं। नक्षत्रों के उदय (भगण) से सौरभगण घटाने से शेष भूमि सावन दिन होते हैं। अर्थात्‌ नाक्षत्र भगण - सौर भगण = सावन दिन।
पूर्वाक्त अधिमास, दिनक्षय (क्षयतिथि), नाक्षत्र-चान्द्र-सावन दिनों की संख्या तथा ग्रहों की भगण संख्या को एक सहस्न (१०००) से गुणा करने पर एक कल्प में अधिमासादि की संख्या हो जाती है।
पूर्वाभिमुख गमन करते हुये एक कल्प में सूर्य का मन्दोच्च ३८७ भगण, मंगल का मन्दोच्च २०४ भगण, बुध का मन्दोच्च ३६८,
गुरु का मन्दोच्च ९०० भगण, शुक्र का मन्दोच्च ५३५ तथा शनि का मन्दोच्च ३९ भगण पूर्ण करता है। पात (ग्रहविमण्डल और क्रान्तिमण्डल का सम्पात) विपरीत दिशा में (पश्चिमाभिमुख ) भ्रमण करता है।
एक कल्प में मंगल का पात २१४, बुध का पात ४८८, गुरु का पात १७४, शुक्र का पात ९०३, एवं शनि का पात ६६२ भगण पूर्ण करता है।
चन्द्रोच्य और चन्द्रमा के पात (राहु) का भगण पहले ही (द्र॒० श्लो० ३३) कहा जा चुका है।
सन्धियों सहित ६ मनुओं के काल (सौरवर्ष प्रमाण) में कल्प के आदि की सन्धि जोड़कर वैवस्वत (सप्तम) मनु के
२७ महायुगों एवं २८ वें महायुग के सत्ययुग के वर्ष मान को जोड़कर योगफःल से सृष्ट्यारम्म काल को घटाने से
शेष सत्ययुग के अन्त में सृष्ट्यारम्म से गतसौरवर्ष संख्या होगी। जिसका प्रमाण १५९५३७२०००० सौरवर्ष है।
इसके (पूर्वोक्त सृष्ट्यादि से कृत युगान्त सौर वर्ष में) अनन्तर गत वर्षो की संख्या को जोड़कर योग को १२ से गुणा कर मास बना ले तथा अभीष्ट समय तक के चैत्र शुक्लादि गत मासों की संख्या को जोड़कर दो स्थानों में रखें।
एक स्थान पर मास संख्या को युगाधिमास से गुणाकर युग सौर मासों की संख्या से भाग दें। लब्धि सृष्ट्यादि से गत मासों में अधिमास संख्या होगी। अधिमास को दूसरे स्थान में स्थित मास में जोड़ने से चान्द्रमास होगें। इसमें ३० का गुणा कर दिनात्मक बना लें तथा उसमें गत तिथि जोड़ कर योगफल को दो स्थानों में रखें।
एक स्थान पर दिन संख्या को युगक्षय तिथियों की संख्या स्ने गुणा कर युगचान्द्र दिनों (युगतिथियां ) से भाग देने पर लब्धि क्षयतिथियों की संख्या होगी। उसे द्वितीय स्थान में स्थित दिन संख्या से घटाने पर शेष सावन दिन संख्या होगी। सावन दिन संख्या में १ रात्रि (१ दिन) घटाने से लड्ढा में अर्द्ध रात्रि कालिक सावन अहर्गण होता है।
उक्त अहर्गण द्वारा सूर्य से आरम्भ कर सूर्यादि ग्रह क्रम से दिन, मास और वर्ष के स्वामी होते हैं। अहर्गण को ७ से भाग देने पर शेष संख्या तुल्य सूर्यादिग्रह दिवा स्वामी होता है।
अहर्गण को दो स्थानों में रखकर एक स्थान में मास दिन संख्या अर्थात्‌ ३० से तथा दूसरे स्थान पर वर्ष दिन (३६० ) से भाग देने पर जो लब्धि हो उसमें क्रम से २ और ३ से गुणाकर १-१ जोड़ने से जो संख्या हो उसे पृथक-पृथक्‌ ७ से भाग देने पर क्रम से शेष तुल्य रव्यादि ग्रह मासेश और वर्षेश होते है।
अहर्गण को अपने-अपने युग भगण से गुणा कर युग सावन दिवसों से भाग देने पर भगणादि मध्यम ग्रह होते हैं। (अर्थात्‌ प्रथम लब्धि भगण, शेष को १२ से गुणाकर युग सावन दिनों से भाग देने पर द्वितीय लब्धि राशि एवमेव ३० »< शेष + युगसावन > अंश आदि )।
पूर्वोक्त रीति से अनुपात द्वारा अपने अपने शीघ्रोच्च एवं मन्दोच्च, जिनकी गति पूर्वाभिमुख बतलाई गई है, उनका भी आनयन किया जा सकता है। तथा विलोम (वक्र ) गति वाले पातों का भी साधन होता है। परन्तु साधित राश्यादि मान को चक्र (१२ राशि) में घटाने पर ही मेषादि राशियों के अनुसार पात ग्रह होता है।
बृहस्पति के गत भगणों की संख्या को १२ से गुणा कर उसमें वर्तमान भगण की राशि संख्या को जोड़कर ६० से भाग देने पर शेष संख्या तुल्य विजयादि क्रम से संवत्सर होते हैं।
यह सब मैने विस्तार पूर्वक कहा। अब युगारम्भ से सभी ग्रहों के मध्यममानानयन की संक्षिप्त एवं व्यावहारिक विधि बतला रहा हूँ।
इस कृत युग (सत्य युग) के अन्त में पात एवं मन्दोच्चों को छोड़कर सभी ग्रहों के मध्यम मान समानता को प्राप्त कर मेष राशि के आरम्भ बिन्दु पर थे। चन्द्रमा का उच्च मकर राशि के आरम्भ बिन्दु पर तथा चन्द्रमा का पात (राहु) तुलाराशि के आरम्भ बिन्दु पर था।
मन्द गति के कारण अन्य ग्रहों के पात पूर्णरूप से अंशो का उपभोग नहीं कर पाये थे, (फलत: वे राशियों के मध्यवर्ती अंशो में ही थे ), इसलिए उनके सम्बन्ध में कुछ भी नहीं कहा गया।
आठ सौ योजन का द्विगुणितमान अर्थात्‌ १६०० योजन पृथ्वी का कर्ण (व्यास) होता है। उस (व्यास) के वर्ग को दश से गुणा कर गुणनफल का वर्गमूल लेने से भूपरिधि होती है।
भूपरिधि को स्वदेशीय लम्बज्या से गुणाकर त्रिज्या से भाग देने पर लब्धि स्वदेशीय (इष्ट) भूपरिधि होती है। इष्टस्थान के देशान्तर योजन को ग्रहगति कला से गुणाकर स्वदेशीय भूपरिधि से भाग देने पर
लब्ध कलादि फल को, रेखादेश से पूर्व में गणितागत ग्रह में घटाने तथा पश्चिम में जोड़ने से स्वदेशीय मध्यमग्रह होते हैं। (इष्टस्थान यदि रेखा देश से पूर्व हो तो मध्यमग्रह में घटाने तथा इष्टस्थान पश्चिम होने पर मध्यम ग्रह में जोड़ने से इष्ट स्थान के अर्धरात्रिकालिक ग्रह होते हैं।)
राक्षों के आवास लड्डा, देवताओं के स्थान सुमेरु पर्वत (उत्तरी ध्रुव) के मध्यगतं सूत्र (रेखा) पर स्थित सेहीतक (रोहतक), अवन्ती (उज्जैन), सन्निहित सरोवर (क्रुक्षेत्र) नामक स्थान रेखा देश कहे जाते हैं। (रेखादेश का अभिप्राय है शून्य देशान्तर 'रेखान्तर'” भूमध्य स्थित याम्योत्तर रेखा)
पूर्णग्रस्त (खग्रास चन्द्र ग्रहण के समय) चन्द्रमा जब भूमि की छाया से बाहर निकलने लगता है तो उसे उन्मीलन काल कहा जाता है। यदि गणितागत उन्मीलन काल के बाद वेधसिद्ध (दृश्य) उन्मीलन काल हो तो स्वस्थान मध्य रेखा देश से पूर्व में स्थित समझना चाहिये।
यदि गणितागत काल से पहले ही उन्मीलन दृश्य हो तो स्वस्थान रेखा देश से पश्चिम में समझना चाहिए । इस उन्मीलन काल से भी इष्ट स्थान का पूर्वापर ज्ञान किया जा सकता है।
गणितागत एवं दृक्सिद्ध समयान्तर (देशान्तर काल) को स्पष्ट भूपरिधि से गुणाकर ६० से भाग देने से लब्धि देशान्तर योजन होती है। लब्धि तुल्य योजन स्वदेशीय (स्फुट) परिधि में मध्यरेखा से पूर्व या पश्चिम में स्वस्थान होता है।
रेखादेश से पूर्ववर्ती देशों में रेखादेशीय मध्यरात्रि काल से देशान्तर नाडी तुल्य अधिककाल में (मध्यरात्रि काल) वारप्रवत्ति होती है। इसी प्रकार पश्चिमस्थ देशों में देशान्तर घटी तुल्य पहले वार प्रवृत्ति (मध्यरात्रि काल में) होती है।
ग्रह की मध्यम गति कला को इष्ट घटी से गुणा कर ६० का भाग देने से जो कलादि लब्धि हो उसे गत इष्ट घटी होने पर मध्यरात्रि कालिक ग्रह में घटाने तथा गम्य इष्टघटी हो तो मध्यरात्रि कालिक ग्रह में जोड़ने से इष्टकालिक ग्रह होता है।
चन्द्रमा अपने पात (क्रान्ति मण्डल चन्द्रविमण्डल के सम्पात) स्थान के प्रभाव से क्रान्ति वृत्तीय अपने मध्य स्थान से भचक्रकला (२१६०० कला) के ८०वें (अर्थात्‌ २१६०० + ८० > २७०) भाग तुल्य दूरी तक उत्तर और दक्षिण में विक्षिप्त होते (बलात्‌ हट जाते) हैं।
चन्द्रमा के विक्षेप (२७००) के द्विगुणित नवमांश (२७० x २)/९ = ६० तुल्य गुरु उत्तर एवं दक्षिण तक आकृष्ट होता है। चन्द्र विक्षेप के त्रिगुणित नवमांश (२७० x ३)/९ = ९० तुल्य स्वस्थान से मंगल उत्तर एवं दक्षिण अपकृष्ट होता है। इसी प्रकार बुध, शुक्र और शनि चन्द्र विक्षेप के चतुर्गुणित नवमांश तुल्य अर्थात्‌ (२७० x ४)/९ = १२० तुल्य स्वक्रान्ति स्थान से उत्तर और दक्षिण अपने-अपने पातों द्वारा हटा दिये जाते हैं।
इस प्रकार ३ का घन अर्थात्‌ २७, ९, १२, ६, १२, १२ को दश से गुणा करने पर क्रम से चन्द्रादि ग्रहों की विक्षेप कला होती है। यथा--- चन्द्रमा की २७ x १० = २७० मंगल की ९ x १० = ९० बुध की १२ x १० = १२० गुरु की ६ x १० = ६० शुक्र की १२ x १० = १२० शनि की १२ x १० = १२० विक्षेप कला सिद्ध होती है।
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