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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 1 • श्लोक 65
षष्ट्या विभज्य लब्धैस्तु योजनै: प्रागथापरीै: । स्वदेश: परिधो ज्ञेय: कुर्याद्देशान्तरं हि तै: ॥
गणितागत एवं दृक्सिद्ध समयान्तर (देशान्तर काल) को स्पष्ट भूपरिधि से गुणाकर ६० से भाग देने से लब्धि देशान्तर योजन होती है। लब्धि तुल्य योजन स्वदेशीय (स्फुट) परिधि में मध्यरेखा से पूर्व या पश्चिम में स्वस्थान होता है।
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