कृतयुगादि प्रत्येक युगों के सन्ध्या संध्यांशों से युक्त चतुर्युग का मान कहा गया है । कृतन्त्रेता-द्वापर-कलियुगों की पाद (१२०० दिव्य वर्ष ) व्यवस्था धर्मपाद के अनुरूप ही है। (अर्थात् कृत (सत्य ) युग में चार, त्रेता में तीन, द्वापप मे २ तथा कलियुग में श पाद धर्म होता है । इसी के अनुरूप कृतयुग ४ पाद (४+८१२०० दिव्य वर्ष ), त्रेता तीन पाद, तथा कलियुग १ पादतुल्य (दिव्यवर्ष ) होता है।)
पूरा ग्रंथ पढ़ें
सूर्य सिद्धांत के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
सूर्य सिद्धांत के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।