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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 1 • श्लोक 16
सन्ध्यासन्ध्यांशसहितं विज्ञेयं तच्चतुर्युगम्‌ । कृतादीनां व्यवस्थेयं धर्मपादव्यवस्थया ॥
कृतयुगादि प्रत्येक युगों के सन्ध्या संध्यांशों से युक्त चतुर्युग का मान कहा गया है । कृतन्त्रेता-द्वापर-कलियुगों की पाद (१२०० दिव्य वर्ष ) व्यवस्था धर्मपाद के अनुरूप ही है। (अर्थात्‌ कृत (सत्य ) युग में चार, त्रेता में तीन, द्वापप मे २ तथा कलियुग में श पाद धर्म होता है । इसी के अनुरूप कृतयुग ४ पाद (४+८१२०० दिव्य वर्ष ), त्रेता तीन पाद, तथा कलियुग १ पादतुल्य (दिव्यवर्ष ) होता है।)
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