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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 1 • श्लोक 64
अप्राप्प च भवेत्‌ पश्चादेव॑ वापि निमीलनात्‌ । तयोरन्तरनाडीभिह्न्याद्‌ भूपरिधिं स्फुटमू ॥
यदि गणितागत काल से पहले ही उन्मीलन दृश्य हो तो स्वस्थान रेखा देश से पश्चिम में समझना चाहिए । इस उन्मीलन काल से भी इष्ट स्थान का पूर्वापर ज्ञान किया जा सकता है।
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