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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 1 • श्लोक 4
तोषितस्तपसा तेन प्रीतस्तस्मै वरार्थिने । ग्रहाणां चरित॑ प्रादान्मयाय सविता स्वयम्‌ ॥
अनन्तर उसकी (मय की) तपस्या से सन्तुष्ट होकर ज्योतिष शास्त्र के ज्ञान रूपी वरदान की अभिलाषा रखने वाले मय दानव को अत्यन्त प्रसन्नता के साथ भगवान्‌ सूर्य ने स्वयं ग्रहों के चरित्र (ज्योतिष शास्त्र के ज्ञान) को श़दान किया।
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