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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 1 • श्लोक 5
मयं प्रति सूर्योपदेश: श्रीसूर्य उवाच विदितस्ते मया भावस्तोषितस्तपसा हाहम्‌ । द्यां कालाश्रय ज्ञान ग्रह्मणां चरितं महत्‌ ॥
श्री सूर्य ने कहा - मैंने तुम्हारे भाव (विचार) को समझ लिया है। तुम्हारी तपस्या से में सन्तुष्ट हूँ। अत: मैं काल के आश्रयभूत एवं ग्रहों के महान चरित्र (ग्रह, गति, युति आदि) से परिपूर्ण ज्योतिष शास्त्र के दिव्य ज्ञान को तुम्हें प्रदान करूँगा।
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