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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 1 • श्लोक 68
चन्द्रादीनां परमा विक्षेपकला भचक्रलिप्ताशीत्यंशं परमं दक्षिणोत्तरम्‌ । विक्षिप्यते स्वपातेन स्वक्रान्त्यन्तादनुष्णगु: ॥
चन्द्रमा अपने पात (क्रान्ति मण्डल चन्द्रविमण्डल के सम्पात) स्थान के प्रभाव से क्रान्ति वृत्तीय अपने मध्य स्थान से भचक्रकला (२१६०० कला) के ८०वें (अर्थात्‌ २१६०० + ८० > २७०) भाग तुल्य दूरी तक उत्तर और दक्षिण में विक्षिप्त होते (बलात्‌ हट जाते) हैं।
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