अध्याय 6 — षष्ठोल्लासः
कुलार्णव
86 श्लोक • केवल अनुवाद
स्वर से उत्पन्न कामदायिनी सोलह चन्द्र कलाएँ - १. अमृता, २. मानदा, ३. पूषा, ४. तुष्टि, ५. पुष्टि, ६. रति, ७. धृति, ८. शशिनी, ९. चन्द्रिका, १०. कान्ति, ११. ज्योत्स्ना, १२. श्रीः, १३. प्रीति, १४. अङ्गदा,
क-भ से ठ-ड तक वर्णों की वसुदायिनी बारह सूर्य कलाएँ - १. तपनी, २. तापिनी, ३. धूम्रा, ४. मरीचि, ५. ज्वालिनी, ६. रुचि, ७. सुषुम्ना, ८. भोगदा, ९. विश्व, १०. रोधिनी, ११. धारिणी, १२. क्षमा - ये १२ सौरा (सूर्य की) वसुप्रदा कलाएँ हैं, जो क भ से आरम्भ होकर ठ-ड में समाप्त होती हैं।
ॐकार की कलाओं के नाम, अकार से उत्पन्न ब्रह्मजात १० सृष्टि कलाएँ - १. सृष्टि, २. मेधा, ३. स्मृति, ४. ऋद्धि, ५. कान्ति, ६. लक्ष्मी, ७. घुन्नि, ८. स्थिरा, ९. स्थिति और १०. सिद्धि ये कन्च वर्ग की १० सृष्टि कलाएँ हैं, जो अकार से उत्पन्न हैं और ब्रह्मजात है।