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अध्याय 6 — षष्ठोल्लासः

कुलार्णव
86 श्लोक • केवल अनुवाद
श्री देवी ने कहा - हे कुलेश! मैं पूजन करने वाले का लक्षण सुनना चाहती हूँ। हे प्रभो! मुझे कुलद्रव्यादि का संस्कार और अर्चन बताइए।
पूजन करने वाले का लक्षण ईश्वर ने कहा - हे देवि! सुनिए, आपने जो पूछा है, उसे मैं कहूँगा। उसके सुनने मात्र से उस साधक की देव एवं दानवों द्वारा स्तुति हो जाती है।
पापों से रहित, पुण्य कर्म करने वाले, कुलज्ञान से सुसम्पत्र और दृढ़ व्रत वाले मनुष्य आपका भजन करते हैं।
हे प्रिये! पूर्णाभिषेक से युक्त, वेदशास्त्रार्थ का तत्त्व जानने वाला, देवता और गुरु का भक्त साधक आत्मनिष्ठ होकर अर्चन करे।
हे कुलनायिके! कुलागम के रहस्य का ज्ञाता देवता की आराधना करने के लिए उत्सुक होकर गुरु के उपदेश से युक्त होकर पूजन करें।
हे प्रिये! क्रोध और लोभ से रहित, पशु व्रतों से विमुख रहकर शुद्धात्मा हो अति हर्ष के साथ पूजन करे।
हे प्रिये! जब बहुत समय बीतने पर मेरी कृपा से कृतार्थ होने वाले व्यक्ति में दृढ़ भक्ति का उदय हो,
तब भैरव द्वारा कथित द्रव्यों से गुरूपदिष्ट विधि से उनका तर्पण करे। अन्यथा करने से पतन होता है।
हे देवेशि! मन्त्र एवं योग के क्रम से श्रीचक्रपूजन करे। उसे मैं आपके साथ स्वयं सादर स्वीकार करता हूँ।
'मैं भैरव हूँ' - इस अनुभूति के साथ सर्वज्ञ आदि गुणों से युक्त योगिश्रेष्ठ साधक कुलपूजा में अपने को प्रवृत्त करे।
हे देवि! उक्त लक्षणों से युक्त, नियमों का पालन करने वाला जो कौलिक आपका अर्चन करता है, वह भुक्ति और मुक्ति का अधिकारी होता है।
कुलपूजा का स्थान और आसन एवं ध्यान - एकान्त स्थान में, किसी जनरहित वनप्रदेश में या पशु आदि की बाधारहित स्थान में,
या उत्तरमुख बैठकर अमृतसागर में स्थित मणिद्वीप में, कल्पवृक्ष के नीचे, रत्नप्राकार से देदीप्यमान माणिक्यमण्डप का ध्यान करे।
जो पुष्पमालाओं के वितान से सुशोभित है और प्रच्छन्न पट्टवस्त्रों से आवृत, कर्पूर दीप से प्रकाशमान तथा धूपादि की सुगन्ध से सुगन्धित है।
उस मण्डप में अपने को स्थित मानता हुआ स्थिरचित्त से ध्यान करते हुए, हे देवि! श्री गुरुदेव की आज्ञा से कुलपूजा सम्पन्न करे।
१. आत्मशुद्धि, २. स्थानशुद्धि, ३. मन्त्रशुद्धि, ४. द्रव्यशुद्धि और ५. देवशुद्धि - ये पाँच शुद्धियाँ जब तक साधक नहीं करता, तब तक देवपूजा कहाँ सम्पन्न होती है।
हे प्रिये! शुद्ध स्नान, भूतशुद्धि, प्राणायाम और षडङ्गादि समस्त न्यासों से 'आत्मशुद्धि' होती है।
पूजास्थान को सम्मार्जन, अनुलेपन आदि के द्वारा दर्पण के समान स्वच्छ करना और वितान (चंदोवा) धूपदीप पुष्पमाला और पञ्चरंगों से सजाना 'स्थानशुद्धि' कही गई है।
मूलमन्त्र के अक्षरों को मातृका वर्णों से ग्रथित कर क्रम एवं उत्क्रम पूर्वक द्विरावृत्ति करने से 'मन्त्रशुद्धि' कही गई है।
पूजाद्रव्यों और आसन का मूलमन्त्र तथा अस्त्र मन्त्र से प्रोक्षण कर उन्हें धेनुमुद्रा दिखावे - यह 'द्रव्यशुद्धि' कही गई है।
पीठ पर प्राणप्रतिष्ठा कर देवता के विग्रह का सकलीकरण (imagining Him) कर मूलमन्त्र से दीप्तात्मा एवं विद्वान् साधक न्यास द्रव्योदक से तीन बार उसका प्रोक्षण करे - यह 'देवशुद्धि' कही गई है।
इस प्रकार 'पञ्चशुद्धि' कर पूजन प्रारम्भ करें। तभी पूजा सफल होती है, अन्यथा वह निष्फल होती है।
हे प्रिये! 'मण्डल' के बिना पूजा निष्फल होती है, अतः 'मण्डल' की रचनाकर विधिवत् उसमें पूजा करे।
अखण्ड मण्डलाकार विश्व को व्याप्त कर जो स्थित है और त्रैलोक्य जिस 'मण्डल' से शोभायमान है, वह सदाशिवस्वरूप कहा गया है।
चतुरस्त्र उड्डीयान पीठ है, वृत्त (वर्तुल) कामरूप पीठ है, चन्द्रार्थ जालन्धर पीठ है और त्रिकोण (त्र्यस्त्र) पूर्णगिरि पीठ है।
ऐसे 'मण्डल' की पूजा करने के बाद क्रमशः आधारों की स्थापना करनी चाहिए।
१. सामान्यार्घ्य पात्र, २. श्री पात्र, ३. गुरु पात्र, ४. भोग पात्र और ५. बलि पात्र - ये पाँच पात्र है। दो पात्र या तीन पात्र या एक पात्र न रखे।
हे कुलेश्वरि! अपने दाईं ओर से लेकर बाईं ओर तक इन्हें स्थापित कर इनकी पूजा करे और मूल मन्त्र से आसव द्वारा पूर्ण करे। फिर इनमें माष अर्थात् उरद के बराबर मत्स्य और मांस खण्ड छोड़े।
तर्पण द्रव्य का विचार नष्ट, बासी, जूठे, दुर्गन्धित, गन्धहीन एवं दूसरे के पात्र में स्थित 'हेतु' (मद्य) से किया गया तर्पण निष्फल होता है।
हे कुलेश्वरि! इस प्रकार के अप्रिय द्रव्यों से पात्रों को पूर्ण न करे। हे महेशानि! अमृत के समान स्वादिष्ट, सुगन्धित और मनोहर द्रव्य द्वारा जो तर्पण किया जाता है, वह सिद्धिदायक होता है।
असंस्कृत सुरा पाप, कलह, व्याधि और दुःख धन धान्य को नष्ट करने देने वाली होती है तथा आयु, श्री, कीर्ति, सौभाग्य, वाली कही गई है।
अतः कुलद्रव्य का सविधि संस्कार कर ले। तब अर्चन करे। अन्यथा असंस्कृत द्रव्य का देने वाला और भोग करने वाला नरक में जाता है, इसमें सन्देह नहीं।
द्रव्यों की प्रतिष्ठा किए बिना न जप करे, न ध्यान। जो ऐसा न कर ध्यान करते हैं, उन मूर्खों को पग पग पर दुःख होता है।
आसव के बिना मन्त्र मन्त्र नहीं होता और मन्त्र के बिना आसव निरर्थक होता है। परस्पर विरोध होने से पूजा कैसे हो सकती है?
हे प्रिये! अतः इस सम्बन्ध में जो सन्देह हो, उसका निवारण गुरुमुख से कर ले। मद्य का अमृतीकरण - वीक्षण, प्रोक्षण, ध्यान, मन्त्र और मुद्रा से संशोधित द्रव्य तर्पण करने के योग्य है। उससे देवता प्रसन्न होते हैं।
अग्नि, सूर्य, इन्दु (चन्द्र), ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, रुद्र और सदाशिव के चौबीस मन्त्रों से मद्य परामृत बन जाता है।
स्वर से उत्पन्न कामदायिनी सोलह चन्द्र कलाएँ - १. अमृता, २. मानदा, ३. पूषा, ४. तुष्टि, ५. पुष्टि, ६. रति, ७. धृति, ८. शशिनी, ९. चन्द्रिका, १०. कान्ति, ११. ज्योत्स्ना, १२. श्रीः, १३. प्रीति, १४. अङ्गदा,
१५. पूर्णा, १६. पूर्णामृता - ये १६ स्वरों से से उत्पन्न सौम्या (चन्द्र की) कलाएँ कामप्रदायिनी हैं।
क-भ से ठ-ड तक वर्णों की वसुदायिनी बारह सूर्य कलाएँ - १. तपनी, २. तापिनी, ३. धूम्रा, ४. मरीचि, ५. ज्वालिनी, ६. रुचि, ७. सुषुम्ना, ८. भोगदा, ९. विश्व, १०. रोधिनी, ११. धारिणी, १२. क्षमा - ये १२ सौरा (सूर्य की) वसुप्रदा कलाएँ हैं, जो क भ से आरम्भ होकर ठ-ड में समाप्त होती हैं।
य से क्ष तक वर्णों की दस धर्मदायिनी अग्निकलायें - १. धूम्रार्चि, २. उष्मा, ३. ज्वलिनी, ४. ज्वालिनी, ५. विस्फुलिङ्गिनी, ६. सुश्री, ७. सुरूपा, ८. कपिला, ९. हव्यवहा और १०. कव्यवहा - ये अग्नि की धर्मप्रदा कलाएँ हैं, जो 'य' वर्ण से प्रारम्भ (क्ष पर्यन्त) होती हैं।
ॐकार की कलाओं के नाम, अकार से उत्पन्न ब्रह्मजात १० सृष्टि कलाएँ - १. सृष्टि, २. मेधा, ३. स्मृति, ४. ऋद्धि, ५. कान्ति, ६. लक्ष्मी, ७. घुन्नि, ८. स्थिरा, ९. स्थिति और १०. सिद्धि ये कन्च वर्ग की १० सृष्टि कलाएँ हैं, जो अकार से उत्पन्न हैं और ब्रह्मजात है।
उकार से उत्पन्न विष्णुजात १० स्थिति कलाएँ - १. जरा, २. पालिनी, ३. शान्ति, ४. ईश्वरी, ५. रति, ६. कामिका, ७. वरदा, ८. हलादिनी, ९. प्रीति और १०. दीर्घा - ये ट-त वर्ग की १० स्थितिकलाएँ हैं, जो उकार से उत्पन्न हैं और विष्णुजाता है।
मकार से उत्पन्न रुद्रजात १० संहार कलाएँ - १. तीक्ष्णा, २. रौद्री, ३. भया, ४. निद्रा, ५. तन्द्रा, ६. क्षुत्, ७. क्रोधिनी, ८. क्रिया, ९. उत्कारी और १०. मृत्यु-ये प-य वर्ग की १०. संहार कलाएँ है, जो मकार से उत्पन्न हैं और रुद्रजात है।
बिन्दु से उत्पन्न ईश्वरजात ४ तिरोधान कलायें - १. पीत, २. श्वेत, ३. अरुण और ४. असित - ये ष-वर्ग की ४ तिरोधानकलायें हैं, जो बिन्दु से उत्पन्न हैं और ईश्वरजात हैं।
नाद से उत्पन्न सदाशिवजात १६ अनुग्रहात्मक कलाएँ - १. निवृत्ति, २. प्रतिष्ठा, ३. विद्या, ४. शान्ति, ५. इन्धिका, ६. दीपिका, ७. रेचिका, ८. मोचिका, ९. परा,
१०. सूक्ष्मा, ११. सूक्ष्मामृता, १२. ज्ञाना, १३. अमृता, १४. आप्यायिनी, १५. व्यापिनी और १६. व्योमरूपा - ये स्वरों की सोलह अनुग्रहकलायें है, जो नाद से उत्पन्न हैं और सदाशिवजात हैं।
तत्त्वसंस्कार के मन्त्र- ब्रह्म कलाओं के पूजन के बाद 'हंसः' इत्यादि मन्त्र से, विष्णु कलाओं के बाद 'प्रतद्विष्णु' इत्यादि मन्त्र से, रुद्र कलाओं के बाद 'त्र्यम्बकं' इत्यादि यजुः मन्त्र से,
ईश्वर कलाओं के बाद 'तद् विष्णोः' इत्यादि मन्त्र से और सदाशिव कलाओं के पूजन के बाद 'विष्णुयोंनिं' इत्यादि मन्त्र से पूजन करे। इन ९४ मन्त्रों से पूजन करने से मन्त्र, आत्मा और देवता के भाव की सिद्धि मिलती है।
हे कुलनायिके! उक्त पाँच मन्त्र है। उक्त पूजन के बाद निम्न तीन मन्त्रों से प्रथम तत्त्व को अभिमन्त्रित करे - अखण्डैकरसानन्दकरे स्वच्छन्दस्फुरणामत्र परसुधात्मनि । निधेह्मकुलरूपिणि ।। अकुलस्थामृताकारे सिद्धिज्ञानकरे परे । अमृतत्त्वं विधेह्यस्मिन् वस्तूनि क्लिन्त्ररूपिणि ।। तरूपेणैकस्यं च कृत्वार्ध्य तत्स्वरूपिणि । भूत्वा परामृताकारं मयि चित्स्फुरणं कुरु ।।
अमृतेशी मन्त्र - अब द्रव्य को शुद्ध करने वाला ३५ अक्षरों का 'त्यमृतेशी' नामक मन्त्र जपे। यथा - ऐं प्लू स्त्रौं जूं सः अमृते अमृतोद्धवे अमृतेश्वरि अमृतवर्षिणि अमृतं स्त्रावय स्रावय स्वाहा।
इसके बाद सर्वसिद्धिदायक ३७ अक्षरों का 'दीपनी' नामक मन्त्र जपे। यथा - ऐं वद वद वाग्वादिनि ऐं क्लीं क्लिन्ने क्लेदिनि क्लेदय महामोक्षं कुरु कुरु क्लीं हसौं मोक्ष कुरु कुरु हसौं स्हौं।
पात्रशुद्धि की विधि - इस प्रकार, इन कलाओं, मातृका, अखण्डैक आदि मन्त्रों, अमृतेशी, दीपनी मन्त्रों और मूल मन्त्र का क्रमशः एक, दो, तीन, चार, पाँच और आठ बार स्मरण कर पात्र का पूजन कर उसे 'धेनुमुद्रा' दिखाए।
पात्रशुद्धि का मन्त्र - अन्त में निम्न मन्त्र से पात्र को शुद्ध करे:- ब्रह्माण्डखण्डसम्भूतमशेषरससम्मृतम् । आपूरितं महापात्रं पीयूषरसमावह ।।
इसके बाद उक्त प्रकार से शुद्ध किये गये द्रव्य से और गन्ध पुष्पाक्षतों से तथा न्यासोक्त सभी मन्त्रों से, हे प्रिये! अपनी पूजा करे।
सिर पर श्रीगुरुप‌ङ्क्ति की और मूलाधार में श्री पादुका की पूजा करे। दिव्य सिद्ध एवं मानवौध गुरु पंक्तियाँ - दिव्यौघ पङ्क्ति में - १. आदिनाथ और २. उनकी शक्ति, ३ सदाशिव और
६. उनकी भार्या, ७. रुद्र और ८. उनकी वधु, ९. विष्णु और १०. उनकी प्रिया, ११. ब्रह्मा और १२. उनकी पत्नी - ये बारह है।
सिद्धौघ प‌क्ति में - १. सनक, २. सनन्दन, ३. सनातन, ४. सनत्कुमार, ५. सनत्सुजात, ६. ऋभुक्षज, ७. दत्तात्रेय, ८. रैवतक, ९. वामदेव, १०. व्यास और ११. शुक - ये ग्यारह है।
मानवौघ पक्ति में - १. नृसिंह, २. महेश, ३. भास्कर, ४. महेन्द्र ५. माधव, ६. विष्णु - ये छः कहे गए हैं।
दिव्यौष में प्रत्येक नाम के अन्त में 'नमः' और 'परम शिव' की, सिद्धौष में 'नमः और 'महाशिव' की तथा मानवौघ में 'नमः' और 'सदाशिव' की योजना करे।
देवी के आवाहन का मन्त्र- हे प्रिये! तदनन्तर पीठपूजा कर देवी का आवाहन निम्न मन्त्र से करे:- महापद्मवनान्तः स्थे । कारणानन्दविग्रहे । सर्वभूतहिते ! मातरेोहि परमेश्वरि ।। देवेशि । भक्तिसुलभे ! सर्वावरणसंयुते । यावत् त्वां पूजयामीह तावत् त्वं सुस्थिरा भव ।।
इस मन्त्र से आवाहन कर देवी का ध्यान करे और मुद्रा दिखाकर गन्ध पुष्पाक्षत आदि से उनकी पूजा सावधान चित्त होकर करे।
ब्रह्म के रूप की कल्पना का कारण - चिन्मय, अप्रमेय, निर्गुण और अशरीरी ब्रह्म के रूप की कल्पना साधकों के हित के लिये की गई है।
देवी की आराधना के दश स्थान - १. लिङ्ग, २. स्थण्डिल, ३. वह्नि, ४. जल, ५. वस्त्र, ६. सूर्य, ७. मण्डल, ८. फलक, ९. मूर्ध्नि और १०. हृदय - इन १० स्थानों में कर्मकाण्ड में तत्पर लोग अरूपा भगवती को रूपवती बनाकर परमा शिव का पूजन करते हैं।
प्रतीक में पूजन करने का कारण - जिस प्रकार गायों के सारे शरीर में व्याप्त दूध उनके स्तन से स्स्रवित होता है, उसी प्रकार सर्वत्र व्याप्त देवता प्रतिमाओं आदि में विराजमान रहते हैं।
बिम्ब के पूजन की अनुरूपता और साधक के विश्वास से देवता का सामीप्य मिलता है। गाय का घी शरीर में स्थित रहता हुआ भी अङ्गों को पुष्ट नहीं करता। अपने कर्म के द्वारा रचित घृत देने पर उसे ही पुष्ट करता है। इसी प्रकार घी के समान सभी शरीरों में स्थित परमेश्वरी उपासना के बिना मनुष्यों को फल नहीं देतीं।
नियमपालन का महत्त्व - सकलीकरण कर, देवता के प्राणों और इन्द्रियों को समुद्दीप्त कर तथा प्राणप्रतिष्ठा कर अर्चन करे। हे देवि! अन्यथा कोई फल नहीं होता।
मन्त्रहीन, क्रियाहीन और विधिहीन अङ्ग या पद जो कुछ हो, उसे क्षमाप्रार्थना द्वारा सिद्ध करे।
नियम से अतिरिक्त जो भी कर्म किया जाता है, उसका कोई भी फल क्रमदोष के कारण नहीं होता।
न्यून या अधिक कर्मों का कभी फल नहीं होता। यथाविधि किये गए सत्कर्म ही फल देते हैं।
जप, होम, अर्चन आदि में उनकी विधिपूर्वक किये गए कर्म ही देवता को प्रसन्न करने वाले होते हैं और भुक्ति मुक्तिरूपी फलदायक होते हैं।
देवता मन्त्र और यन्त्र में ऐक्य - देवता, मन्त्र और यन्त्र की परस्पर व्यापकता को जाने बिना जो अर्चन आदि किया जाता है, वह सब हे शाम्भवि! व्यर्थ होता है।
'यन्त्र' मन्त्रमय कहा गया है और 'देवता' मन्त्ररूपिणी है। 'यन्त्र' में उनका पूजन किये जाने से हे देवि! वह तुरन्त ही प्रसन्न होती है।
'यन्त्र' शब्द की व्युत्पत्ति - काम क्रोधादि दोषों से उत्पत्र सभी प्रकार के दुःखों का नियन्त्रण करने से इसे 'यन्त्र' कहते हैं। 'यन्त्र' में पूजा करने से देवता प्रसन्न होते हैं।
हे प्रिये! जीव के लिए जैसे शरीर है और दीपक के लिये जैसे तेल या घी है, उसी प्रकार सभी देवताओं के लिए उनका प्रतिष्ठित 'यन्त्र' होता है।
हे प्रिये! अतः 'यन्त्र' की रचना कर तथा साकार शिव का ध्यान कर और गुरुमुख से सब कुछ जानकर विधिपूर्वक पूजन करे।
यन्त्रपूजा की विधि - एक पीठ में पृथक् देवताओं की पूजा उनके यन्त्रों के बिना जो करता है, अङ्गाङ्गी भाव न होने से उस साधक को देवता का शाप मिलता है।
हे कुलेशानि! अतः एक पौठ में पृथक् देवताओं की पूजा उनके अलग यन्त्रों में उनकी पद्धति से उनके आवरणों के सहित अलग अलग करनी चाहिए।
एक देवता का आवाहन कर अन्य देवता का पूजन करने वाला चञ्चल मन साधक दोनों ही देवताओं का शाप प्राप्त करता है।
इन नियमों को गुरुदेव से और शास्त्र से जानकर, हे प्रिये! विधिपूर्वक सोलह उपचारों से अन्नों और आवरणों सहित शिव का अर्चन करे, तो देवता प्रसन्न होते हैं। हे शाम्भवि! मूलमन्त्र से गन्धपुष्पाक्षतादि के द्वारा महाषोढा में उल्लिखित समस्त परिवार का, प्रत्येक नाम के आदि में प्रणव (ॐ) और अन्त में 'नमः' लगाकर पूजन करे।
देवतर्पण की विधि - हे कुलनायिके! आगमोक्त मार्ग से अलि (मद्य) बिन्दुओं से तर्पण करे। अपने पात्र में स्थित द्रव्य में से विधिवत अंगुष्ठ और अनामिका (तीसरी अंगुलि) इन दोनों के संयुक्त नख से द्रव्य ऊपर निकालकर मूल मन्त्र और पादुका का जप कर अन्तःशक्ति का स्मरण करते हुये देवताओं का तर्पण करे।
अंगुष्ठ भैरवरूप हैं और अनामा चण्डिकारूप। इन दोनों के योग से कुलसन्तति (शक्ति परिवार) का तर्पण करे।
हे प्रिये! वश्यकर्म में अंगुष्ठ और अनामिका से, अभिचार कर्म में तर्जनी और अंगुष्ठ से तथा स्तम्भन धर्न में कनिष्ठा और अंगुष्ठ से तर्पण करना चहिए।
इस प्रकार यथा विधि कुलद्रव्यों से तर्पण कर तीनों गुरु पंक्तियों को समुचित रूप से जानकर देवता के समक्ष सावधानीपूर्वक उनका पूजन करना चाहिए।
गुरुपंक्ति का ध्यान- निम्न प्रकार गुरु पंक्ति का ध्यान करे। यथा- कराभ्यां चिन्मुद्रां समधुनृकपालं च दधतीं द्रुतस्वर्णप्रख्यामरुणकुसुमालेपवसनाम् । कृपापूर्णापाङ्गीमरुणनयनामम्बरजटा-मुपेतां तिस्स्रौधैर्यजतु गुरुप‌क्तिं कृतमतिः ।। दोनों हाथों में चिन्मुद्रा धारण करने वाली, मधु के सहित नर कपाल लिए हुए, स्वर्ण के समान और अरुण वर्ण के पुष्पों का वस्त्र धारण करने वाली, कृपापूर्ण लाल-लाल नेत्रों वाली, अम्बर रूप जटा धारण करने वाली तीनों पक्ति से युक्त गुरुपङ्क्ति का साधक यजन करे।
इस प्रकार ध्यानपूर्वक धूप, दीप, नैवेद्य आसव और मांसयुक्त विविध भक्ष्य पदार्थ, केला आदि फल तथा ताम्बूल समर्पित करे।
इस प्रकार मैंने कुलाचार के लक्षण, द्रव्य, संस्कार एवं शुद्धि आदि को बताया। अब हे देवि! आप अन्य क्या सुनना चाहती है?
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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