नासवेन विना मन्त्रो न मन्त्रेण विनासवः ।
परस्परविरोधित्वात् कथं पूजा विधीयते ॥
आसव के बिना मन्त्र मन्त्र नहीं होता और मन्त्र के बिना आसव निरर्थक होता है। परस्पर विरोध होने से पूजा कैसे हो सकती है?
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