द्विपात्रं वा त्रिपात्रं वा एकपात्रं न कारयेत् ।
स्वदक्षिणादिवामान्तं स्थाप्याभ्यर्थ्यासवेन तु ॥
१. सामान्यार्घ्य पात्र, २. श्री पात्र, ३. गुरु पात्र, ४. भोग पात्र और ५. बलि पात्र - ये पाँच पात्र है। दो पात्र या तीन पात्र या एक पात्र न रखे।
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