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कुलार्णव • अध्याय 6 • श्लोक 49
मन्त्रजापश्च संप्रोक्त आत्मस्तवश्च पञ्चभिः । अत्र ये (ते) पञ्च संप्रोक्ता मन्त्रास्ते कुलनायिके ॥ अखण्डैकरसानन्दाकरे परसुधात्मनि । स्वच्छन्दस्फुरणामत्र निधेह्यकुलरूपिणि ॥ अकुलस्थामृताकारे सिद्धिज्ञानकरे परे । अमृतत्वं विधेह्यस्मिन् वस्तुनि क्लिन्नरूपिणि ॥ तद्रूपेणैकरस्यञ्च कृत्वार्घ्य तत्स्वरूपिणि । भूत्वा परामृताकारं मयि चित्स्फुरणं कुरु ॥
हे कुलनायिके! उक्त पाँच मन्त्र है। उक्त पूजन के बाद निम्न तीन मन्त्रों से प्रथम तत्त्व को अभिमन्त्रित करे - अखण्डैकरसानन्दकरे स्वच्छन्दस्फुरणामत्र परसुधात्मनि । निधेह्मकुलरूपिणि ।। अकुलस्थामृताकारे सिद्धिज्ञानकरे परे । अमृतत्त्वं विधेह्यस्मिन् वस्तूनि क्लिन्त्ररूपिणि ।। तरूपेणैकस्यं च कृत्वार्ध्य तत्स्वरूपिणि । भूत्वा परामृताकारं मयि चित्स्फुरणं कुरु ।।
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