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कुलार्णव • अध्याय 6 • श्लोक 50
वाग्भवं पार्श्वगं भूमिः पुष्टिरिन्दुसमन्विता । स्थितिश्च पावकानुग्रहार्थेन्दुसमलङ्कृता ॥ स्थिरेन्धिकेन्दुसंयुक्ता श्वेता बिन्दुयुगान्विता । तथामृते पदं ब्रूयात्तत्पश्चादमृतोद्भवे ॥ तथामृतेश्वरीत्युक्त्वा पश्चादमृतवर्षिणि । अमृतं स्त्रावयद् द्वन्द्वं द्विठान्तो द्रव्यशुद्धिकृत् । अमृतेशीमनुः प्रोक्तः पञ्चत्रिंशद्भिरक्षरैः ॥
अमृतेशी मन्त्र - अब द्रव्य को शुद्ध करने वाला ३५ अक्षरों का 'त्यमृतेशी' नामक मन्त्र जपे। यथा - ऐं प्लू स्त्रौं जूं सः अमृते अमृतोद्धवे अमृतेश्वरि अमृतवर्षिणि अमृतं स्त्रावय स्रावय स्वाहा।
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