हे प्रिये! वश्यकर्म में अंगुष्ठ और अनामिका से, अभिचार कर्म में तर्जनी और अंगुष्ठ से तथा स्तम्भन धर्न में कनिष्ठा और अंगुष्ठ से तर्पण करना चहिए।
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