हे कुलेश्वरि! अपने दाईं ओर से लेकर बाईं ओर तक इन्हें स्थापित कर इनकी पूजा करे और मूल मन्त्र से आसव द्वारा पूर्ण करे। फिर इनमें माष अर्थात् उरद के बराबर मत्स्य और मांस खण्ड छोड़े।
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