लिङ्गस्थण्डिलवल्यम्बुसूपकुड्यपटेषु च । मण्डले फलके मूर्नि हृदि वा दश कीर्त्तिताः ॥
एषु स्थानेषु देवेशि यजन्ति परमां शिवाम् । अरूपां रूपिणीं कृत्वा कर्मकाण्डरता नराः ॥
देवी की आराधना के दश स्थान - १. लिङ्ग, २. स्थण्डिल, ३. वह्नि, ४. जल, ५. वस्त्र, ६. सूर्य, ७. मण्डल, ८. फलक, ९. मूर्ध्नि और १०. हृदय - इन १० स्थानों में कर्मकाण्ड में तत्पर लोग अरूपा भगवती को रूपवती बनाकर परमा शिव का पूजन करते हैं।
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