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कुलार्णव • अध्याय 6 • श्लोक 35
तत्संशयनिवृत्तिञ्च ज्ञात्वा गुरुमुखात् प्रिये। वीक्षणं प्रोक्षणं ध्यानं मन्त्रमुद्राविशोधनम् । द्रव्यं तर्पणयोग्यं स्याद्देवताप्रीतिकारकम् ॥
हे प्रिये! अतः इस सम्बन्ध में जो सन्देह हो, उसका निवारण गुरुमुख से कर ले। मद्य का अमृतीकरण - वीक्षण, प्रोक्षण, ध्यान, मन्त्र और मुद्रा से संशोधित द्रव्य तर्पण करने के योग्य है। उससे देवता प्रसन्न होते हैं।
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