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कुलार्णव • अध्याय 6 • श्लोक 65
आभिरूप्याच्च बिम्बस्य पूजायाश्च विशेषतः । साधकस्य च विश्वासात् सन्निधौ देवता भवेत् ॥ गवां सर्पिः शरीरस्थं न करोत्यङ्गपोषणम् । स्वकर्मरचितं दत्तं पुनस्तामेव पोषयेत् ॥ एवं सर्वशरीरस्था सर्पिर्वत् परमेश्वरी । विना चोपासनां देवि न ददाति फलं नृणाम् ॥
बिम्ब के पूजन की अनुरूपता और साधक के विश्वास से देवता का सामीप्य मिलता है। गाय का घी शरीर में स्थित रहता हुआ भी अङ्गों को पुष्ट नहीं करता। अपने कर्म के द्वारा रचित घृत देने पर उसे ही पुष्ट करता है। इसी प्रकार घी के समान सभी शरीरों में स्थित परमेश्वरी उपासना के बिना मनुष्यों को फल नहीं देतीं।
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