अध्याय 3 — तृतीयोल्लासः
कुलार्णव
79 श्लोक • केवल अनुवाद
देवों में जैसे विष्णु, ज्योतियों (नक्षत्रों) में जैसे सूर्य, तीर्थों में जैसे काशी, नदियों में जैसे गङ्गा, पर्वतों में जैसे मेरु, वृक्षों में जैसे चन्दन, यज्ञों में जैसे अश्वमेध, पत्थरों में जैसे मणि, रसों में जैसे मधुरता, धातुओं में जैसे स्वर्ण, पशुओं में जैसे गाय, पक्षियों में जैसे हंस, आश्रमों में जैसे भिक्षु, वर्षों में जैसे ब्राह्मण, मनुष्यों में जैसे राजा, अङ्गों में जैसे शिर, सुगन्धियों में जैसे कस्तूरी और पुरियों में जैसे काशी श्रेष्ठ है, वैसे ही हे प्रिये! सब धर्मों में ऊर्ध्वाम्नाय की श्रेष्ठता है।
हे देवि! इस ऊर्ध्वाम्नाय को जो तत्त्वतः जानता है वह सबका वन्दनीय, सद्गुरु, पूजनीय, दैवज्ञ, मान्त्रिक, सेवनीय, स्तुत्य, दर्शनीय, सात्विक, व्रती, तपस्वी, अनुष्ठाता, पूजक, वेदागम शास्त्रादि सब विद्याओं में विशारद, आचार्य, बुद्धिमान् यति, कौलिक, याज्ञिक, पूतात्मा, (मन्त्र) जापी, साधक, योगी, उत्तम, वीर, पुण्यात्मा, सर्वज्ञ और सब कुछ होकर कृतार्थ हो जाता है और हे प्रिये! वह मुक्त होकर शिवस्वरूप होता है।
'पराप्रासादमन्त्र' से यह चराचर जगत् व्याप्त है। हे देवि! तत्त्वतः ये दोनों अभिन्न हैं, उसी प्रकार जैसे तालवृन्त में वायु, बीज में अंकुर, तिल में तैल, अग्नि में ऊष्णता, सूर्य में प्रकाश, चन्द्रमा में चाँदनी, लकड़ी में अग्नि, पुष्प में गन्ध, जल में द्रवता, शब्द में अर्थ, शिव में शक्ति, दूध में घी, फल में स्वाद, शर्करा में मिठास, चन्दन में ठण्डक, मन्त्र में निग्रह और अनुग्रह, मूर्ति में देवता, दर्पण में प्रतिबिम्ब और वायु में गति के समान विद्यमान है। प्रासादमन्त्र में यह प्रपञ्च भी उसी प्रकार स्थित है।
हे प्रिये! ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र सहित इन्द्रादि श्रेष्ठ देवता, वसु, रुद्र एवं द्वादश आदित्य, दिक्पाल, मनु, चन्द्रादि और मार्कण्डेय आदि मुनि और वसिष्ठ आदि मुनीश्वर, सनकादि योगीश, जीवन्मुक्त शुकादि तथा यक्ष, किन्त्रर, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर आदि सभी इस अमित फलदायक, प्रभावशाली तथा पुण्यवान् श्रीप्रासादपरामन्त्र को पाकर, हे पार्वति! आज भी जपते रहते हैं।
पराप्रासादमन्त्र का जप करने वाले सामर्थ्य, पूजा, ज्ञान, तेज, सुख, आरोग्यता, राज्य, स्वर्ग एवं मोक्ष प्राप्त करते है, और वे ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र तथा विष्णु के पद से भी आगे बढ़ जाते हैं। पराप्रासादमन्त्र का ज्ञाता सर्वकर्मविहीन होते हुये भी सहज ही जिस गति को प्राप्त करता है, उसे कोई भी धार्मिक व्यक्ति प्राप्त नहीं कर पाता।
हे प्रिये! शची और इन्द्र, रोहिणी और चन्द्र, स्वाहा और अग्नि, प्रभा और सूर्य, लक्ष्मी और नारायण, सरस्वती और ब्रह्मा, रात्रि और दिन, अग्नि और चन्द्र, बिन्दु और नाद, प्रकृति एवं पुरुष, आधार एवं आधेय, भोग और मोक्ष, प्राण और अपान, शब्द और अर्थ, विधि और निषेध, सुख और दुःख इत्यादि जितने द्वन्द्व समस्त लोकों में दिखाई या सुनाई देते हैं, वे सब, हे कुलेश्वरि! हम दोनों के ही स्वरूप हैं इसमें सन्देह नहीं है। पुरुष और स्त्री के समस्त रूप हम दोनों के ही अंश है।
यही परम ज्ञान है, यही परम तप है, यही परम ध्यान है, यही परम अर्चन है, यही परा दीक्षा है और यही परम जप है। यही परम तत्त्व है, यही परम व्रत है, यही परम यज्ञ है, यही परम श्रेय है, यही परम फल है, यही परम ब्रह्म है और यही परा गति है। यही परमं गुह्य है, यह सत्य है, इसमें सन्देह नहीं। इस श्रेष्ठ मन्त्र को ऐसा मान कर उसमें सदा निष्ठा रखे।
हे देवी! श्रीप्रासादपरामन्त्र को दो सौ बार जो जप करता है, वह पिछले चौरासी लाख योनियों के अपने विविध एवं असंख्य जीवनों की बाल्य, यौवन, वृद्धावस्था में, जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति दशाओं में मन, वचन, कर्म से ज्ञान या अज्ञानपूर्वक किये गये समस्त महापापों एवं करोड़ों उपपाप समूहों से छूटकारा पा जाता है, इसमें सन्देह नहीं है, हे वरानने! यह सत्य है।