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अध्याय 3 — तृतीयोल्लासः

कुलार्णव
79 श्लोक • केवल अनुवाद
हे कुल के ईश, हे प्रभो! मैं सब धर्मों में उत्तमोत्तम ऊर्ध्वाम्नाय, उसका मन्त्र और उसकी महिमा सुनना चाहती हूँ। अतः आप उसे मुझे बताइये।
ईश्वर ने कहा - हे देवि! सुनिए, जो आपने पूछा है, उसे मैं बताऊँगा। उसके सुनने मात्र से देवता अत्यन्त प्रसन्न होते हैं।
हे कुलेश्वरि! मैंने इसे पहले कभी नहीं बताया है। आपके स्नेह से ऊर्ध्वाम्नाय को बताता हूँ, हे प्रिये आप सुनिए। हे कुलेश्वरि! वेद, शास्त्र एवं पुराण प्रकट करने योग्य हैं किन्तु शैव और शाक्त आगम सभी गुप्त रूप से कहे गये हैं। हे पार्वति! कुल शास्त्र तो रहस्य से भी रहस्यपूर्ण हैं।
हे अम्बिके! ऊर्ध्वाम्नाय का यह तत्त्व तो रहस्यों में भी अति रहस्यपूर्ण है क्योंकि यह पूर्णब्रह्मात्मक परम तत्त्व है। इसे मैने यत्नपूर्वक गुप्त रखा है किन्तु अब प्रकाशित कर रहा हूँ।
मैंने अपने पाँच मुखों से - १. पूर्वाम्नाय, २. पश्चिमाम्नाय, ३. दक्षिणाम्नाय, ४. उत्तराम्नाय और ५. ऊर्ध्वाम्नाय - ये पाँच आम्नाय कहे हैं। ये पाँचों मोक्षमार्ग के प्रवर्तक शास्त्र हैं।
हे वरारोहे! आम्नाय बहुत से है किन्तु वे ऊर्ध्वाम्नाय के समकक्ष नहीं है, यह सत्य है। इसमें विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
हे कुलनायिके! चारों आम्नायों से बहुत से गुप्त आम्नायों की उत्पत्ति हुई है। इस तन्त्र में मैं प्रथमतः आपके समक्ष प्रतिपादित करता हूँ।
हे कामिनी! चार आम्नायों के जानने वाले तो बहुत है, किन्तु हे वीरवन्दिते! ऊर्ध्वाम्नाय के तत्त्व को जानने वाले बहुत कम ही लोग हैं।
प्रत्येक आम्नाय के असंख्य मन्त्र कहे गए है, जो भुक्ति और मुक्ति के देने वाले हैं तथा पृथ्वी पर जितने धूल के कण है इसी प्रकार प्रत्येक आम्नाय के असंख्य उपमन्त्र भी कहे गए हैं। संसार के कल्याण की इच्छा से मैंने, ही उन सब को कहा है।
उन सभी मन्त्रों के देवता हम दोनों के अंशों से सम्भूत हैं और हे सुन्दर स्मित हास वाली देवि! वे निर्दिष्ट फलों को देते हैं।
सभी मन्त्रों को केवल मैं जानता हूँ, अन्य कोई नहीं जानता। मेरी कृपा से ही करोड़ों मनुष्यों में से कोई एक कुछ मन्त्रों को जान पाता है।
केवल एक आम्नाय को जो जान लेता है, वह मुक्त हो जाता है। इसमें सन्देह नहीं। फिर चार आम्नायों के ज्ञाता की क्या बात है, वह तो साक्षात् शिव ही हो जाता है।
हे प्रिये! चार आम्नायों के विशेष ज्ञान से भी श्रेष्ठ ऊर्ध्वाम्नाय है। अतएव यदि आत्मसिद्धि की इच्छा है तो उसी को जानना चाहिये।
सब धर्मों से ऊर्ध्व होने के कारण ऊर्ध्वाम्नाय श्रेष्ठ है। निम्न स्थित व्यक्ति को ऊर्ध्वगामी करने से यह 'ऊर्ध्वाम्नाय' कहलाता है।
हे कुलेशानि! इसका तत्त्व उच्च स्तर का है, संसारसागर (के मोह) को यह नष्ट करता है और ऊर्ध्व लोक इसकी सेवा करते हैं। अतएव यह 'ऊर्ध्वाम्नाय' कहलाता है।
हे देवेशि! ऊर्ध्वाम्नाय को मोक्ष का एकमात्र साधन जानना चाहिए। यह सब आम्नायों से अधिक फल देने वाला और श्रेष्ठ में भी श्रेष्ठतम है।
हे प्रिये! जिस प्रकार सारे लोकों में सबसे अधिक पूज्य मैं हूँ, उसी प्रकार हे शिवे! सभी आम्नायों में ऊर्ध्वाम्नाय श्रेष्ठ है।
देवों में जैसे विष्णु, ज्योतियों (नक्षत्रों) में जैसे सूर्य, तीर्थों में जैसे काशी, नदियों में जैसे गङ्गा, पर्वतों में जैसे मेरु, वृक्षों में जैसे चन्दन, यज्ञों में जैसे अश्वमेध, पत्थरों में जैसे मणि, रसों में जैसे मधुरता, धातुओं में जैसे स्वर्ण, पशुओं में जैसे गाय, पक्षियों में जैसे हंस, आश्रमों में जैसे भिक्षु, वर्षों में जैसे ब्राह्मण, मनुष्यों में जैसे राजा, अङ्गों में जैसे शिर, सुगन्धियों में जैसे कस्तूरी और पुरियों में जैसे काशी श्रेष्ठ है, वैसे ही हे प्रिये! सब धर्मों में ऊर्ध्वाम्नाय की श्रेष्ठता है।
हे वीरवन्दिते! नाना जन्मों में उपार्जित अपार पुण्यकर्मों का फल उदय होने से ऊर्ध्वाम्नाय का ज्ञान मिलता है, अन्यथा नहीं।
लाखों मनुष्यों में वह व्यक्ति धन्य है, जो कुलदर्शन अर्थात् शाक्तदर्शन को जानता है। उन लाखों में कोई ही ऊर्ध्वाम्नाय को जानता है।
श्रीमद् गुरुदेव के मुख के बिना ऊर्ध्वाम्नाय का ज्ञान नहीं हो सकता। न तो वेदों, आगमों, शास्त्रों, पुराणों के विस्तृत अध्ययन से, न करोडों यज्ञों, तपों, तीर्थों, व्रतों से और हे देवेशि! न मन्त्रौषधि आदि अन्य उपायों से ऊर्ध्वाम्नाय का ज्ञान मिलता है।
अतः ऊर्ध्वाम्नाय के अर्थ को जानने वाले उन्हीं दयालु, सर्वज्ञ एवं सर्वगुणसम्पन्न गुरुदेव की खोज करनी चाहिये और हे देवेशि! हे कुलेश्वरि! उनसे ऊर्ध्वाम्नाय को जानना चाहिये।
हे देवि! जो मनुष्य ऊर्ध्वाम्नाय के तत्त्व को जान लेता है, वह अभीष्ट सिद्धि को प्राप्त करता है, हे वरानने! यह सर्वथा सत्य है।
श्री गुरु के मुख से जो उचित प्रकार से ऊर्ध्वाम्नाय को अच्छी तरह जानता है, वह शास्त्रोक्त मार्ग से जीवन्मुक्त हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं।
हे देवि! इस ऊर्ध्वाम्नाय को जो तत्त्वतः जानता है वह सबका वन्दनीय, सद्‌गुरु, पूजनीय, दैवज्ञ, मान्त्रिक, सेवनीय, स्तुत्य, दर्शनीय, सात्विक, व्रती, तपस्वी, अनुष्ठाता, पूजक, वेदागम शास्त्रादि सब विद्याओं में विशारद, आचार्य, बुद्धिमान् यति, कौलिक, याज्ञिक, पूतात्मा, (मन्त्र) जापी, साधक, योगी, उत्तम, वीर, पुण्यात्मा, सर्वज्ञ और सब कुछ होकर कृतार्थ हो जाता है और हे प्रिये! वह मुक्त होकर शिवस्वरूप होता है।
हे देवि! उसका वंश पवित्र हो जाता है, उसकी माता धन्य (होकर पुण्य स्मरणीया) हो जाती है। उसका पिता कृतार्थ होता है और हे प्रिये! उसके पितरों की मुक्ति हो जाती है। उसके वंशज पुण्यवान् होते हैं और उसके सभी मित्र, बन्धु बान्धव पवित्र हो जाते हैं।
बहुत कहने से क्या लाभ? ऊर्ध्वाम्नाय परायण साधक को स्मरण, कीर्तन, अभिवन्दन, सम्भाषण करने से राजसूय से भी अधिक फल मिलता है।
हे देवि! जहाँ वह साधक निवास करता है, वहाँ लक्ष्मी और विजय होती है। उस स्थान में नीरोगता, अन्नादि की बहुलता, सुन्दर वर्षा और सदा शान्ति रहती है।
अतः गुरु की प्रसन्नता से जो उत्तम मनुष्य ऊर्ध्वाम्नाय को वास्तव में तत्त्वतः जान लेता है, हे देवि। वह मुझे बहुत ही प्रिय होता है।
हे देवि! पूर्वाम्नाय सृष्टि रूप है और दक्षिणाम्नाय स्थिति रूप; पश्चिमाम्नाय संहार रूप है और उत्तराम्नाय (श्रीमतोत्तर) अनुग्रह रूप है।
दूसरे प्रकार से पूर्वाम्नाय मन्त्रयोग है और दक्षिणाम्नाय भक्तियोग है। पश्चिमाम्नाय कर्मयोग है और उत्तराम्नाय ज्ञानयोग है।
पूर्वाम्नाय के चौबीस सङ्केत कहे गये हैं। दक्षिणाम्नाय के सङ्केत पचीस कहे हैं। पश्चिमाम्नाय के सङ्केत बत्तीस हैं और श्रीमद् उत्तराम्नाय में छत्तीस सङ्केत कहे गये हैं।
हे कुलनायिके! किन्तु ये ऊर्ध्वाम्नाय में नहीं है। साक्षात् शिवस्वरूप होने से इस आम्नाय में कुछ भी कर्म शेष नहीं रहता।
ऊर्ध्वाम्नाय का माहात्म्य मैं जानता हूँ, अन्य नहीं और हे वरानने! मेरे स्नेह से आप जानती है, यह सत्य है। ऊर्ध्वाम्नाय की यह कुछ महिमा मैंने यहाँ आपसे कही है।
हे कुलेशानि! अब उत्तम मन्त्र का माहात्म्य संक्षेप में कहता हूँ। हे पार्वति! मैंने इससे पहले कभी किसी से इसे नहीं कहा है। अतः हे प्राणवल्लभे! मैं आपके स्नेहवश इसे कहता हूँ, इसे आप मुझसे सुनिए।
ऊर्ध्वाम्नाय में 'श्रीप्रासादपरा' मन्त्र अधिष्ठित है, जो हम दोनों का परम स्वरूप है। अतः उसे जो जानता है, वह स्वयं शिव हो जाता है।
हे प्रिये! शिव से कृमि तक सभी प्राणियों में प्राणवायु के मार्ग से निःश्वास उच्छवास के रूप में यह मन्त्र विद्यमान रहता है।
जैसे हवा के बिना आकाश में बादल नहीं ठहरते, वैसे ही 'श्रीपराप्रासादमन्त्र' के बिना यह लोक नहीं ठहर सकता।
'पराप्रासादमन्त्र' से यह चराचर जगत् व्याप्त है। हे देवि! तत्त्वतः ये दोनों अभिन्न हैं, उसी प्रकार जैसे तालवृन्त में वायु, बीज में अंकुर, तिल में तैल, अग्नि में ऊष्णता, सूर्य में प्रकाश, चन्द्रमा में चाँदनी, लकड़ी में अग्नि, पुष्प में गन्ध, जल में द्रवता, शब्द में अर्थ, शिव में शक्ति, दूध में घी, फल में स्वाद, शर्करा में मिठास, चन्दन में ठण्डक, मन्त्र में निग्रह और अनुग्रह, मूर्ति में देवता, दर्पण में प्रतिबिम्ब और वायु में गति के समान विद्यमान है। प्रासादमन्त्र में यह प्रपञ्च भी उसी प्रकार स्थित है।
जिस प्रकार बटबीज में सूक्ष्म रूप से वृक्ष निहित है। इस पराप्रासादमन्त्र में ब्रह्माण्ड भी उसी प्रकार स्थित है।
हे कुलेश्वरि! जिस प्रकार अच्छे पके हुये, रसीले पदार्थों में नमक के बिना खाने वाले को स्वाद नहीं मिलता, उसी प्रकार जो मन्त्र पराप्रासादमन्त्र से सङ्गत नहीं हैं, वे मन्त्रशक्ति से रहित होकर फल नहीं देते।
श्रीप्रासादपरामन्त्र को प्रयत्न करके गुप्त रखना चाहिये ।
पुराणों के सभी अर्थों को, मन्त्रों को और दर्शनाम्नायों के भेदों से उत्पन्न विविध शास्त्रों को मैं जानता हूँ।
इन्द्रादि देवता आपकी माया से मोहित होकर विविध शास्त्रों में प्रमित होते रहते हैं और संसार के कष्टों में पड़कर जन्म लेते व मरते रहते हैं किन्तु आपकी माया से मोहित होकर वे, हे कुलेश्वरि! श्रीप्रासाद परामन्त्र का गान नहीं करते और मोक्ष को नहीं प्राप्त करते।
मेरे स्वरूपभूत श्री गुरुदेव में जिसकी दृढ़ भक्ति होती है, वही श्रीप्रासादपरामन्त्र को जानकर मुक्त होता है।
सहस्रों पूर्वजन्मों में शैवादि समयों (धर्मों) का पालन करते हुये गुरु की आज्ञा से चार आम्नायों के मन्त्रों की जो उपासना करता है, वह पापशरीर से मुक्त होकर शुद्धात्मा और गुरु का प्रिय होता है और वही श्रीप्रासादपरामन्त्र को जान पाता है, दूसरा नहीं।
हे प्रिये! ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र सहित इन्द्रादि श्रेष्ठ देवता, वसु, रुद्र एवं द्वादश आदित्य, दिक्पाल, मनु, चन्द्रादि और मार्कण्डेय आदि मुनि और वसिष्ठ आदि मुनीश्वर, सनकादि योगीश, जीवन्मुक्त शुकादि तथा यक्ष, किन्त्रर, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर आदि सभी इस अमित फलदायक, प्रभावशाली तथा पुण्यवान् श्रीप्रासादपरामन्त्र को पाकर, हे पार्वति! आज भी जपते रहते हैं।
पराप्रासादमन्त्र का जप करने वाले सामर्थ्य, पूजा, ज्ञान, तेज, सुख, आरोग्यता, राज्य, स्वर्ग एवं मोक्ष प्राप्त करते है, और वे ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र तथा विष्णु के पद से भी आगे बढ़ जाते हैं। पराप्रासादमन्त्र का ज्ञाता सर्वकर्मविहीन होते हुये भी सहज ही जिस गति को प्राप्त करता है, उसे कोई भी धार्मिक व्यक्ति प्राप्त नहीं कर पाता।
उसके घर में चिन्तामणि, कामधेनु और कल्पतरु सदैव विद्यमान रहते हैं तथा पराप्रासाद का जप करने वालों की सेवा साक्षात् कुबेर करते हैं।
जिस प्रकार दिव्यमणि के स्पर्श से लौह स्वर्ण बन जाता है, उसी प्रकार पराप्रासाद के जप से पशु साधक भी पशुपति हो जाता है।
श्रीप्रासादपरामन्त्र को जो तत्त्वतः जानता है, वह मुझे और आपको जान जाता है और हम दोनों का अति प्रिय हो जाता है।
हे पार्वति! पराप्रासादमन्त्र का ज्ञाता चाण्डाल भी मूर्ति आदि में देवता की स्थापना करने का अधिकारी होता है, इसमें सन्देह नहीं।
केवल पराप्रासाद नामक मन्त्र को जो साधक जानता है, वह चाण्डाल भी मुक्त हो जाता है, तब इस मन्त्र के जपादि विधि विधान को जानने वाले की तो बात ही क्या है।
पराप्रासादमन्त्र को जानने वाला जो चाहता है और जो बोलता है, वह सब हे महेशानि! तप, ध्यान और जपस्वरूप ही होता है।
हे महेशानि! दीक्षापूर्वक परम्परा क्रमयुक्त जो पराप्रासादमन्त्र को जानता है, वह निःसन्देह मुझे ही प्राप्त कर लेता है।
समस्त चराचर जगत् से युक्त सभी चौदह भुवन पराप्रासादमन्त्र के जानने वाले के शरीर में सदैव विद्यमान रहते हैं। हे भामिनी! पराप्रासादमन्त्र जानने वाला जहाँ रहता है, वह स्थान और उसके स्थान के चारों ओर दश योजन तक का स्थान 'दिव्यक्षेत्र' माना जाता है।
हे कुलनायिके! सुर और असुर पराप्रासादमन्त्र के अर्थ का तत्त्व जानने वाले की वन्दना करते हैं, फिर मनुष्यों का क्या कहना।
हे पार्वति! पराप्रासादमन्त्र जानने वाला जहाँ रहता है, वह स्थान मुनियों और देवताओं द्वारा मेरा 'सिद्धक्षेत्र' माना जाता है।
पराप्रासाद मन्त्र का ज्ञाता शैव, वैष्णव, शाक्त, सौर, गाणपत्य और चन्द्र सम्प्रदाय के सभी मन्त्रों को जानता है। श्री प्रासादपरामन्त्र जिसके जिह्वाय में रहता है, उसके दर्शनमात्र से चाण्डाल भी मुक्त हो जाता है।
हे प्रिये! चाहे ब्राह्मण हो या अन्त्यज, चाहे पवित्र हो या अपवित्र जो पराप्रासाद का जप करने वाला है, वह निस्सन्देह मुक्त है।
चाहे चलते हुये जप करे या बैठे हुये, चाहे जागते हुये जप करे या सोते हुये, यह पराप्रासादमन्त्र हे देवेशि! कभी निष्फल नहीं होता।
सहस्रों प्रचलित मन्त्रों में से प्रत्येक मन्त्र पर्याप्त विलम्ब से और केवल एक ही फल प्रदान करते हैं। किन्तु हे कुलेशि! यह मन्त्रराज शीघ्र ही सर्व फलों को प्रदान करता है।
यह पराप्रासादमन्त्र सब मन्त्रों में श्रेष्ठ है। चाहे ज्ञानपूर्वक इसका भजन करे या अज्ञानपूर्वक, यह मन्त्र सदैव अभीष्ट प्रदान करता है।
हे प्रिये! शची और इन्द्र, रोहिणी और चन्द्र, स्वाहा और अग्नि, प्रभा और सूर्य, लक्ष्मी और नारायण, सरस्वती और ब्रह्मा, रात्रि और दिन, अग्नि और चन्द्र, बिन्दु और नाद, प्रकृति एवं पुरुष, आधार एवं आधेय, भोग और मोक्ष, प्राण और अपान, शब्द और अर्थ, विधि और निषेध, सुख और दुःख इत्यादि जितने द्वन्द्व समस्त लोकों में दिखाई या सुनाई देते हैं, वे सब, हे कुलेश्वरि! हम दोनों के ही स्वरूप हैं इसमें सन्देह नहीं है। पुरुष और स्त्री के समस्त रूप हम दोनों के ही अंश है।
हे कुलेश्वरि! यह अरूप, भावनागम्य, परंब्रह्म, निष्कल, निर्मल, नित्य, निर्गुण, आकाशवत् अनन्त, अव्यय और मनवाणी से परे है। इस पराप्रासाद का अर्थ केवल ध्यान से ही प्रकाशित होता है।
इसी से हे देवि! इस मन्त्र का नाम 'पराप्रासाद' है। यह पर तत्त्व का स्वरूप है अतः सत्, चित् तथा आनन्द इसके लक्षण हैं।
शिवशक्ति से यह ओतप्रोत है; भुक्ति और मुक्ति का यह देने वाला है; सकर्मा होते हुये भी यह निष्कर्म है; सगुण होते हुये भी निर्गुण है।
अतएव यह श्रीप्रासादपरामन्त्र सब मन्त्रों का शिरोमणि है। इसका जप करने से भुक्ति और मुक्ति दोनों प्राप्त होती है, इसमें सन्देह नहीं।
अधिक कहने से क्या, हे प्रिये! सब बातों का सार सुनिए। श्रीप्रासादपरामन्त्र के समान कोई मन्त्र नहीं है।
यही परम ज्ञान है, यही परम तप है, यही परम ध्यान है, यही परम अर्चन है, यही परा दीक्षा है और यही परम जप है। यही परम तत्त्व है, यही परम व्रत है, यही परम यज्ञ है, यही परम श्रेय है, यही परम फल है, यही परम ब्रह्म है और यही परा गति है। यही परमं गुह्य है, यह सत्य है, इसमें सन्देह नहीं। इस श्रेष्ठ मन्त्र को ऐसा मान कर उसमें सदा निष्ठा रखे।
श्रीप्रासादपरामन्त्र की जप विधि यह है कि आगमोक्त विधि से क्रमपूजा सहित श्रीप्रासादपरा मन्त्र का एक सौ आठ बार जप करे। इससे ब्रह्महत्या आदि पाँच महापापों से मुक्त हो जाता है।
हे देवी! श्रीप्रासादपरामन्त्र को दो सौ बार जो जप करता है, वह पिछले चौरासी लाख योनियों के अपने विविध एवं असंख्य जीवनों की बाल्य, यौवन, वृद्धावस्था में, जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति दशाओं में मन, वचन, कर्म से ज्ञान या अज्ञानपूर्वक किये गये समस्त महापापों एवं करोड़ों उपपाप समूहों से छूटकारा पा जाता है, इसमें सन्देह नहीं है, हे वरानने! यह सत्य है।
हे देवि! श्री प्रासादपरामन्त्र को जो तीन सौ बार जप करता है, वह समस्त प्रकार के यज्ञों का जो फल है, समस्त दानों का जो फल है, समस्त व्रतों का जो फल है और सभी तीर्थों का जो पुण्यफल है, वह समस्त फल हे देवि! प्राप्त करता है इसमें कोई तर्क वितर्क नहीं सोंचना चाहिए।
श्री प्रासादपरामन्त्र को चार सौ बार जो जप करता है, उसके द्वार पर अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ सब सिद्धियों सहित सेवा करती हैं और जो भी उसकी मनोकामना होती है, वह निःसन्देह पूर्ण होती है। धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष साक्षात् उसके हाथ में स्थित है और हे देवि! सालोक्य सारूप्य आदि चारों प्रकार की मुक्ति वह प्राप्त करता है। हे कुलनायिके! साधक को इसमें सन्देह नहीं करना चाहिए, यह सत्य है।
हे कुलनायिके! जो श्रीप्रासादपरामन्त्र का पाँच सौ बार जप करता है, उसके फल का वर्णन करने में मैं समर्थ नहीं हूँ।
अतएव भुक्ति एवं मुक्ति पाने के लिए हे कुलनायिके! सभी प्रकार से प्रयत्न करके, सब अवस्थाओं में, सदैव श्रीप्रासादपरामन्त्र का जप करना चाहिये।
गुरु से अधिक कोई तत्त्व नहीं है, न शिव से अधिक कोई दैवत है। वेद से अधिक कोई विद्या नहीं है, न कौल के समान कोई दर्शन है। न कुल से अधिक कोई ज्ञान है, न ज्ञान से अधिक कोई सुख है। न अष्टाङ्ग से अधिक कोई पूजा है, न मोक्ष से अधिक कोई फल है। यह सत्य है, यह सत्य है। यह सर्वथा सत्य है, इसमें संशय नहीं करना चाहिए।
हे वरारोहे! श्रीप्रासादपरामन्त्र का माहात्म्य मैं कोटिशत कल्पों में भी नहीं कह सकता। फिर भी पर्वत का सरसों बराबर और सागर के बालू के कण के समान इस मन्त्र की कुछ महिमा मैंने आपको बताई है।
इस प्रकार हे देवि! ऊर्ध्वाम्नाय और श्रीप्रासादपरामन्त्र का माहात्म्य मैंने आपको बताया। अब आप क्या सुनना चाहती है? इस प्रकार कुलार्णवतन्त्र के ऊर्ध्वाम्नायतन्त्र में श्रीप्रासादपरामन्त्रकथन नामक तृतीय उल्लास की पं० चित्तरञ्जन मालवीय कृत हिन्दी व्याख्या पूर्ण हुई।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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