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कुलार्णव • अध्याय 3 • श्लोक 79
ऊर्ध्वाम्नायस्य माहात्म्यं श्रीप्रासादपरामनोः । इति ते कथितं देवि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ॥ इति श्रीकुलार्णवे निर्वाणमोक्षद्वारे महारहस्ये सर्वागमोत्तमोत्तमे सपादलक्षग्रन्ये पञ्चमखण्डे ऊर्ध्वाम्नायतन्त्रे श्रीप्रासाद- परामन्त्रकथनं नाम तृतीयोल्लासः ॥
इस प्रकार हे देवि! ऊर्ध्वाम्नाय और श्रीप्रासादपरामन्त्र का माहात्म्य मैंने आपको बताया। अब आप क्या सुनना चाहती है? इस प्रकार कुलार्णवतन्त्र के ऊर्ध्वाम्नायतन्त्र में श्रीप्रासादपरामन्त्रकथन नामक तृतीय उल्लास की पं० चित्तरञ्जन मालवीय कृत हिन्दी व्याख्या पूर्ण हुई।
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