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कुलार्णव • अध्याय 3 • श्लोक 64
शचीन्द्रौ रोहिणीचन्द्रौ स्वाहाग्नी च प्रभारवी । लक्ष्मीनारायणौ वाणीधातारौ रात्रिवासरौ ॥ अग्नीषोमौ बिन्दुनादौ देवि प्रकृतिपूरुषौ । आधाराधेयनामानौ भोगमोक्षौ कुलेश्वरिं ॥ प्राणापानौ च वागर्थी प्रिये विधिनिषेधकौ । सुखदुःखादि यद् द्वन्द्वं दृश्यते श्रूयते मया । सर्वलोकेषु तत् सर्वमावामेव न संशयः ॥ पुंस्त्रीरूपाणि सर्वाणि चावयोरंशकानि हि ।
हे प्रिये! शची और इन्द्र, रोहिणी और चन्द्र, स्वाहा और अग्नि, प्रभा और सूर्य, लक्ष्मी और नारायण, सरस्वती और ब्रह्मा, रात्रि और दिन, अग्नि और चन्द्र, बिन्दु और नाद, प्रकृति एवं पुरुष, आधार एवं आधेय, भोग और मोक्ष, प्राण और अपान, शब्द और अर्थ, विधि और निषेध, सुख और दुःख इत्यादि जितने द्वन्द्व समस्त लोकों में दिखाई या सुनाई देते हैं, वे सब, हे कुलेश्वरि! हम दोनों के ही स्वरूप हैं इसमें सन्देह नहीं है। पुरुष और स्त्री के समस्त रूप हम दोनों के ही अंश है।
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