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कुलार्णव • अध्याय 3 • श्लोक 73
त्रिशतं यो जपेद्देवि श्रीप्रासादपरामनुम् । सर्वक्रतुषु यत् पुण्यं सर्वदानेषु यत् फलम् ॥ सर्वव्रतेषु यत् पुण्यं सर्वतीर्थेषु यत् फलम् । तत् फलं लभते देवि नात्र कार्या विचारणा ॥
हे देवि! श्री प्रासादपरामन्त्र को जो तीन सौ बार जप करता है, वह समस्त प्रकार के यज्ञों का जो फल है, समस्त दानों का जो फल है, समस्त व्रतों का जो फल है और सभी तीर्थों का जो पुण्यफल है, वह समस्त फल हे देवि! प्राप्त करता है इसमें कोई तर्क वितर्क नहीं सोंचना चाहिए।
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