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कुलार्णव • अध्याय 3 • श्लोक 34
ऊर्ध्वाम्नायस्य माहात्म्यमिति ते कथितं मया । ऊर्ध्वाम्नायस्य माहात्म्यमहं वेद्मि न चापरः । मत्स्नेहात्त्वञ्च जानासि सत्यमेतद्वरानने ॥
ऊर्ध्वाम्नाय का माहात्म्य मैं जानता हूँ, अन्य नहीं और हे वरानने! मेरे स्नेह से आप जानती है, यह सत्य है। ऊर्ध्वाम्नाय की यह कुछ महिमा मैंने यहाँ आपसे कही है।
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